अमेरिका जीत गया, दिल्ली में ढोल—18% टैरिफ़ पर सरकार का जश्न

अमेरिका जीत गया, दिल्ली में ढोल—18% टैरिफ़ पर सरकार का जश्न

भारत और अमेरिका के बीच घोषित नई ट्रेड डील को लेकर राजनीतिक और आर्थिक हलकों में बहस तेज़ हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पहले लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ़ को घटाकर 18 प्रतिशत करने को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया है, लेकिन कई अर्थशास्त्री और पूर्व नीति सलाहकार इसे भारत के लिए महंगा समझौता मान रहे हैं।


पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कम्युनिकेशन एडवाइज़र रहे पंकज पचौरी ने इस डील पर सवाल उठाते हुए सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर लिखा कि
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय 2004 तक भारत पर औसत अमेरिकी टैरिफ़ सिर्फ़ 3.31% था।
2014 तक, परमाणु समझौते के बाद यह घटकर 2.93% रह गया था।
उनके अनुसार, “अब 18% टैरिफ़ को उपलब्धि के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि यह ऐतिहासिक रूप से बेहद ऊँचा है।”


अमेरिका की खुली जीत?
ट्रंप प्रशासन इस समझौते को अपनी स्पष्ट जीत बता रहा है। व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलाइन लेविट ने कहा कि यह डील अमेरिकी कारोबारियों, कामगारों और उपभोक्ताओं के हित में है।
ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर दावा किया कि इस समझौते के तहत
भारत रूस से तेल आयात बंद करेगा
अमेरिकी उत्पादों पर भारत में ज़ीरो टैरिफ़ होगा
भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर के उत्पाद खरीदेगा
विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत इन शर्तों को मानता है, तो यह मोदी सरकार के लिए आर्थिक और राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
भारत को क्या मिला?
एबरडीन इन्वेस्टमेंट्स में एशियाई इक्विटीज़ के वरिष्ठ निवेश निदेशक जेम्स थॉम के मुताबिक, इस डील से अमेरिका को निर्यात करने वाले भारत के श्रम-प्रधान सेक्टर—
कपड़ा, चमड़ा, आभूषण, खिलौने और फर्नीचर—को कुछ राहत मिल सकती है।
हालांकि यह राहत भी तुलनात्मक है।
भारत पर 18% टैरिफ़
पाकिस्तान पर 19%
बांग्लादेश और वियतनाम पर 20%
यानी भारत को फायदा मुख्यतः इसलिए दिख रहा है क्योंकि दूसरे प्रतिस्पर्धी देशों पर टैरिफ़ और ज़्यादा है।
निष्कर्ष
विशेषज्ञों का कहना है कि यह डील अमेरिका के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से ज़्यादा फायदेमंद दिखती है।
भारत में इसे कूटनीतिक जीत के तौर पर पेश किया जा रहा है, लेकिन सवाल बना हुआ है—
क्या 18% टैरिफ़ वाकई राहत है या सिर्फ़ 50% की तुलना में कम चोट?
मोदी सरकार भले ही अपनी पीठ थपथपा रही हो, लेकिन इस समझौते की असली परीक्षा आने वाले महीनों में भारतीय उद्योग, ऊर्जा नीति और व्यापार घाटे पर इसके असर से होगी।

Views: 50

TOTAL VISITOR: 50171919