पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने राज्य की राजनीति में एक बार फिर सामाजिक समीकरणों का नया पाठ पढ़ा दिया है। एनडीए ने जहां 243 में से 202 सीटें जीतकर ऐतिहासिक बढ़त बनाई, वहीं तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) को करारी हार का सामना करना पड़ा। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि हार के बावजूद आरजेडी का पारंपरिक एम-वाई (मुस्लिम-यादव) वोट बैंक लगभग जस का तस बना रहा।
एसेंडिया स्ट्रैटेजीज़ के चुनावी विश्लेषण में स्पष्ट है कि राजद की सीटें कम होने के बावजूद महागठबंधन को मिले 38% कुल वोटों में से लगभग 60% वोट अकेले मुस्लिम और यादव समुदायों से आए। महागठबंधन के वोट शेयर में यादवों का योगदान 10% और मुस्लिम वोटों का हिस्सा 13% रहा। यानी पार्टी की सामाजिक नींव में कोई बड़ी दरार नहीं आई।
एनडीए की जीत—सामाजिक विस्तार का कमाल
विपरीत स्थिति में एनडीए की जीत एम-वाई वोट बैंक में सेंध लगाने से नहीं, बल्कि अन्य समुदायों तक अपने प्रभावी विस्तार से हासिल हुई। एनडीए को मिले कुल 47% वोटों में से यादवों और मुसलमानों का योगदान क्रमश: 3% और 2% ही रहा।
एनडीए की जीत में सवर्ण, गैर-यादव ओबीसी, ईबीसी, एससी और एसटी मतदाताओं का निर्णायक समर्थन शामिल रहा।
सवर्ण समुदाय से एनडीए को 7% वोट मिले, जबकि महागठबंधन को सिर्फ 2%।
गैर-यादव ओबीसी में भी एनडीए को 7% और महागठबंधन को केवल 3% वोट मिले।
सबसे बड़ा समर्थन ईबीसी, एससी और एसटी समुदायों से मिला, जो एनडीए के कुल वोट शेयर का लगभग 60% साबित हुआ।
ईबीसी आबादी में से लगभग 15% ने एनडीए को वोट दिया, जबकि महागठबंधन को सिर्फ 6% मिले।
एससी-एसटी वोटरों में भी एनडीए को 13% और महागठबंधन को केवल 4% वोट मिले।
महागठबंधन—रणनीति बिखरी, संगठन लड़खड़ा गया
विश्लेषकों के अनुसार महागठबंधन खासकर आरजेडी की चुनावी रणनीति इस बार प्रभावी नहीं रही। कांग्रेस के कई उम्मीदवारों ने सीट समन्वय में गड़बड़ी और ‘सीट चोरी’ का आरोप लगाया।
लालू प्रसाद यादव के परिवार में भी अंदरूनी खींचतान की खबरें सामने आईं जिससे संगठनात्मक तालमेल कमजोर पड़ा। वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने तेजस्वी यादव पर ‘अहंकार में डूबने’ का आरोप लगाया और सीधे तौर पर इसे हार की मुख्य वजह बताया।
दूसरी ओर, एनडीए ने ग्राउंड पर अपनी टीम को आक्रामक तरीके से उतारा। बाहरी राज्यों से भी नेताओं को लाकर अभियान को गति दी गई। शाहाबाद से लेकर सीमांचल तक एनडीए का प्रदर्शन मजबूत रहा।
निष्कर्ष
ईबीसी, एससी-एसटी और सवर्ण मतदाताओं का भारी झुकाव एनडीए की जीत का आधार बना—जबकि आरजेडी अपने कोर वोटर को बचाने में तो सफल रही, लेकिन सामाजिक गठजोड़ को विस्तार नहीं दे सकी। बिहार की 2025 की चुनावी तस्वीर यह बताती है कि सिर्फ पारंपरिक वोट बैंक अब जीत की गारंटी नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक पहुंच ही भविष्य की राजनीति तय करेगी।
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