क्या फिर लौटेगा सत्ययुग?

शहर की ऊँची इमारतों के बीच रहने वाला आरव हर सुबह शीशे की खिड़की से बाहर झाँकता। नीचे चमकती सड़कें, भागते लोग, मोबाइल की रिंग और विज्ञापनों की चकाचौंध—सब कुछ वैसा ही था जैसा हर दिन। फिर भी उसके भीतर कुछ खाली-सा था।

एक दिन, दादी की पुरानी अलमारी से उसे एक पीली-सी किताब मिली—वेदों का सार। उत्सुकतावश उसने पढ़ना शुरू किया। शब्द पुराने थे, पर भाव अनोखे रूप से जीवित। उनमें प्रकृति के साथ सामंजस्य था, कर्तव्य की गरिमा थी, और जीवन को बोझ नहीं, साधना की तरह जीने का भाव था।

उसी शाम उसने दादी से पूछा,
“क्या सच में सत्ययुग फिर आएगा?”

दादी मुस्कराईं।
“बेटा, सत्ययुग कोई तारीख नहीं है। वह मनुष्य की चेतना की अवस्था है।”

आरव को यह उत्तर सरल लगा, पर गहरा था।

अगले दिनों में उसने बदलाव महसूस किया—
वह अनावश्यक चीज़ों से दूरी बनाने लगा,
सुबह कुछ समय मौन में बैठने लगा,
प्रकृति को केवल देखने नहीं, महसूस करने लगा।

धीरे-धीरे उसने जाना कि चकाचौंध के बीच भी शांति संभव है।

शहर वहीं था—
ट्रैफिक, तकनीक, प्रतिस्पर्धा।
पर आरव बदल चुका था।

उसे समझ आ गया कि शास्त्रों में कहा गया सत्ययुग शायद बाहरी दुनिया का नहीं, आंतरिक यात्रा का नाम है। जब मनुष्य लाभ से पहले कर्तव्य, भोग से पहले संयम और अहंकार से पहले करुणा को चुनता है—वहीं सत्ययुग जन्म लेता है।

शायद पूरी मानवता एक साथ वैदिक जीवन न अपनाए,
लेकिन अगर एक-एक व्यक्ति अपने भीतर प्रकाश जलाए—
तो अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो,
सत्ययुग की शुरुआत हो ही जाती है।

और उस रात, शीशे की खिड़की के पार चमकती दुनिया को देखते हुए,
आरव ने पहली बार महसूस किया—
सत्ययुग कहीं दूर नहीं,
वह यहीं है… मनुष्य के भीतर

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