बिहार विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की अप्रत्याशित और निर्णायक जीत ने न सिर्फ़ देश में राजनीतिक हलचल पैदा की है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया का भी ध्यान अपनी ओर खींचा है। कई वैश्विक प्रकाशनों ने इस जीत को भारत की राजनीति में संभावित बड़े बदलाव का संकेत बताया है—जहाँ सामाजिक कल्याण योजनाएँ, खासकर महिलाओं को दिए गए कैश ट्रांसफ़र, और गठबंधन की रणनीतिक पकड़ को सफलता का मुख्य कारण माना गया है।
सम्पूर्ण समाचार:
नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की जीत को विभिन्न अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने बिहार की सामाजिक–राजनीतिक दिशा में एक निर्णायक मोड़ करार दिया है। कई रिपोर्टों में इस बात पर जोर दिया गया है कि बिहार में महिलाओं को लक्षित कैश ट्रांसफ़र योजनाओं ने चुनावी जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कुछ विदेशी विश्लेषणों ने लिखा कि स्वास्थ्य और उम्र को लेकर उठाए जा रहे सवालों के बावजूद, नीतीश कुमार की राजनीतिक पकड़ और गठबंधन की रणनीति इतनी मजबूत थी कि वह चुनावी नतीजों में साफ झलकती है। एक रिपोर्ट में कहा गया कि “उन्हें भाषणों के लिए मंच पर तो लाया जाता था, लेकिन बाक़ी समय वे सहयोगियों के घेरे में रहते थे, जो उनके बोलने में भूल-चूक और कमजोर होती याददाश्त से चिंतित दिखाई देते थे। इसके बावजूद गठबंधन ने चुनावी जीत दर्ज कर ली।”
प्रसिद्ध वैश्विक विश्लेषक रुचिर शर्मा ने भी बिहार चुनाव पर अपना विस्तृत विश्लेषण साझा किया। वे लिखते हैं कि 30 वर्षों से भारतीय चुनावों को कवर करने के दौरान यह उनका छठा बिहार दौरा था। उनके अनुसार—
“मुझे उम्मीद थी कि नीतीश कुमार की सेहत और ठहरा हुआ विकास चुनावी मुद्दे होंगे, लेकिन पाया कि उनके पारंपरिक समर्थक आज भी उनके शुरुआती कार्यकाल के कामों के लिए शुक्रगुज़ार हैं और उनकी सेहत पर चर्चा को अपमान मानते हैं।”
शर्मा ने याद दिलाया कि दो दशक पहले का बिहार दुनिया के सबसे पिछड़े इलाकों में गिना जाता था—अंधकार, जंगल राज और बदहाल क़ानून-व्यवस्था की छवि से जूझता हुआ प्रदेश। लेकिन अपने पहले कार्यकाल में नीतीश कुमार ने क़ानून-व्यवस्था सुधारने, सड़कों और पुलों के निर्माण, और अगले कार्यकाल में गांव-गांव बिजली पहुँचाने जैसे कदम उठाए।
हालाँकि, पिछले दो कार्यकाल में विकास की रफ़्तार धीमी पड़ी। नौकरियों की कमी एक बड़ी चुनौती बनी रही। पूर्णिया इलाके में मखाना प्रोसेसिंग ही सबसे बड़ा उद्योग है, और राज्य के हर तीन में से दो परिवारों में कोई न कोई सदस्य रोज़गार के लिए बाहर जाता है।
शर्मा लिखते हैं, “अगर बिहार एक देश होता, तो यह लाइबेरिया से भी ग़रीब और दुनिया का 12वाँ सबसे ग़रीब देश होता। फिर भी कुमार की जीत भारत में आशा और बेबसी के टकराव के बारे में बहुत कुछ कहती है।”
वे बताते हैं कि नीतीश के शुरुआती शासन दशक में बिहार की औसत आय देश के बाकी हिस्सों की गति के बराबर चलने लगी थी, लेकिन अब राज्य फिर से पीछे छूट गया है। सरकार का कुल ख़र्च जीडीपी के 34 फ़ीसदी तक पहुँच गया है—जो राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुना है—और इसका आधा हिस्सा सामाजिक योजनाओं पर जाता है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया के अनुसार, यह चुनावी नतीजे संकेत देते हैं कि बिहार की राजनीति में फिलहाल स्थिरता और भरोसे की भावना ने विकास की कमी और नेतृत्व की सेहत जैसे सवालों पर भारी पड़ गया है—और यह पैटर्न आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति को भी नई दिशा दे सकता है।
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