बिहार में शराबबंदी पर सियासी संग्राम: सहयोगी दलों ने उठाई समीक्षा की मांग, सरकार सामाजिक सुधार पर अडिग

बिहार में शराबबंदी पर सियासी संग्राम: सहयोगी दलों ने उठाई समीक्षा की मांग, सरकार सामाजिक सुधार पर अडिग

पटना। बिहार में लागू शराबबंदी कानून को लेकर एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है। सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर ही सहयोगी दलों की ओर से समीक्षा और संशोधन की मांग उठ रही है। हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और हाल में राष्ट्रीय लोक मोर्चा ने भी शराबबंदी कानून के आर्थिक और सामाजिक असर पर सवाल खड़े किए हैं। वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब भी इसे सामाजिक सुधार और महिलाओं की सुरक्षा से जोड़कर देखते हैं।


सामाजिक सुधार बनाम आर्थिक नुकसान
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है कि शराबबंदी से राज्य को भले ही राजस्व का नुकसान हुआ हो, लेकिन सामाजिक स्तर पर सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। सरकार के अनुसार, महिला एवं बाल विकास विभाग और पुलिस के आंकड़ों में घरेलू हिंसा, पारिवारिक झगड़ों और महिला उत्पीड़न से जुड़े मामलों में करीब 12 से 18 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है।
सरकार का दावा है कि शराब के कारण परिवारों में आर्थिक तंगी और सामाजिक तनाव बढ़ रहा था, जिस पर कानून के बाद कुछ हद तक अंकुश लगा है।


NDA के भीतर उठे विरोध के सुर
हालांकि, एनडीए के भीतर ही तीन सहयोगी दल शराबबंदी को लेकर आलोचनात्मक रुख अपनाए हुए हैं।
हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के संस्थापक अध्यक्ष जीतनराम मांझी और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान खुले तौर पर इसकी समीक्षा और जरूरत पड़े तो समाप्त करने की मांग कर चुके हैं।


मुसहर और दलित समुदाय पर ज्यादा असर’ का आरोप
जीतनराम मांझी का आरोप है कि शराबबंदी के कारण मुसहर समुदाय की आजीविका पर गहरा असर पड़ा है। उनका कहना है कि मुसहर समाज के कई लोग शिक्षा और संसाधनों के अभाव में परंपरागत रूप से देसी शराब बनाने के काम से जुड़े थे।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक करीब 16 लाख लोग शराबबंदी कानून के तहत गिरफ्तार हो चुके हैं। मांझी का दावा है कि इनमें मुसहर, बेलदार, बिंद, मांझी समेत अन्य दलित समुदायों के लोग अपेक्षाकृत अधिक संख्या में शामिल हैं।
वे इसे प्रशासनिक सख्ती का असमान असर बताते हैं।


समीक्षा जरूरी, नियंत्रित बिक्री पर विचार’ — चिराग
चिराग पासवान का कहना है कि पूर्ण शराबबंदी के बावजूद बिहार में शराब की उपलब्धता खत्म नहीं हुई है, बल्कि अवैध तस्करी और समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई है।
उनका तर्क है कि सीमित और नियंत्रित शराब बिक्री से राज्य को राजस्व भी मिलेगा और अवैध कारोबार पर लगाम भी लगेगी। वे जहरीली शराब से होने वाली मौतों को भी कानून की विफलता से जोड़ते हैं और कहते हैं कि नियंत्रण तंत्र के अभाव में गरीब तबके की जान जोखिम में पड़ रही है।


जागरूकता अभियान ज्यादा प्रभावी’ — राष्ट्रीय लोक मोर्चा
राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेताओं का मानना है कि पूर्ण प्रतिबंध की बजाय व्यापक जागरूकता अभियान ज्यादा कारगर हो सकता था। पार्टी के नेताओं का कहना है कि कानून से अधिक जरूरी सामाजिक चेतना है।
उनका तर्क है कि बड़े तस्कर अक्सर कानून की पकड़ से बच निकलते हैं, जबकि छोटे कारोबारी और गरीब वर्ग ज्यादा प्रभावित होते हैं। साथ ही राज्य को भारी राजस्व नुकसान भी उठाना पड़ रहा है।


बहस जारी, फैसला सरकार के हाथ
बिहार में शराबबंदी को लेकर यह बहस अब सामाजिक न्याय, आर्थिक हित और प्रशासनिक प्रभावशीलता के त्रिकोण में सिमट गई है। एक ओर सरकार इसे महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक सुधार का प्रतीक मानती है, तो दूसरी ओर सहयोगी दल इसके आर्थिक और व्यावहारिक पक्ष पर सवाल उठा रहे हैं।
हालांकि अंतिम निर्णय मंत्रिमंडल और सरकार के विशेषाधिकार का विषय है, लेकिन बढ़ती राजनीतिक आवाजें संकेत दे रही हैं कि आने वाले समय में शराबबंदी कानून की समीक्षा पर गंभीर मंथन हो सकता है।

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