इंदौर में गंदा पानी पीने से 10 लोगों की मौत का मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। यह घटना अब सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं रही, बल्कि सत्ता की संवेदनशीलता, जवाबदेही और प्रेस की स्वतंत्रता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है। इस पूरे प्रकरण में भाजपा के वरिष्ठ नेता और मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का एक बयान और पत्रकार से किया गया व्यवहार विवाद का केंद्र बन गया है।
घटना के दौरान एनडीटीवी के एक पत्रकार ने इंदौर में दूषित पानी के कारण हुई मौतों को लेकर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से सवाल किया था। पत्रकार का सवाल जनहित से जुड़ा था—कि 10 लोगों की मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा और सरकार ने अब तक क्या कार्रवाई की है। लेकिन आरोप है कि सवाल पूछने पर मंत्री भड़क गए और पत्रकार से आपत्तिजनक भाषा में बात की।
मंत्री द्वारा कथित तौर पर कहा गया,
“तुम फोकट के सवाल मत पूछो, तुम घंटा होकर आए हो।”
यह बयान सामने आते ही सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। पत्रकारिता जगत और आम लोगों में इसको लेकर गहरा रोष देखने को मिला। लोगों का कहना है कि सवाल पूछना पत्रकार का हक ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र में उसकी जिम्मेदारी है।
विवाद यहीं नहीं रुका।
गलती से गलत शब्द
मामले पर सफाई देते हुए मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने बाद में कहा कि गलती से गलत शब्द निकल गए।
हालांकि, इस बयान को लेकर भी नई बहस छिड़ गई है। आलोचकों का कहना है कि इसे “गलती से निकले शब्द” कहकर टाल देना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि यह रवैया सत्ता के अहंकार और असंवेदनशीलता को दर्शाता है। 10 लोगों की मौत जैसे गंभीर मुद्दे पर भाषा और व्यवहार दोनों में जिम्मेदारी अपेक्षित होती है।
इंदौर की इस घटना ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं।
आखिर गंदा पानी सप्लाई होने की जिम्मेदारी किसकी है? क्या जल आपूर्ति की नियमित जांच की गई थी? अगर नहीं, तो इस लापरवाही के लिए कौन जवाबदेह है? इन सवालों का जवाब देने के बजाय अगर सवाल पूछने वालों को ही अपमानित किया जाएगा, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है।
पत्रकार संगठनों ने मंत्री के बयान और व्यवहार की कड़ी निंदा की है। उनका कहना है कि पत्रकारों का अपमान दरअसल जनता की आवाज़ का अपमान है। वहीं विपक्षी दलों ने भाजपा सरकार पर हमला बोलते हुए कहा है कि सत्ता सवालों से डर रही है और जवाबदेही से बचने की कोशिश कर रही है।
लोकतंत्र में पत्रकार “चौथा स्तंभ” माने जाते हैं। उनका काम सत्ता से सवाल पूछना और जनता के मुद्दों को सामने लाना है। सवाल पूछना अगर “फोकट” है, तो फिर 10 मौतों की जवाबदेही क्या है? यह मामला सिर्फ एक पत्रकार और एक मंत्री के बीच बहस का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा का है।
10 मौतें सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि 10 परिवारों की जिंदगी उजड़ने की कहानी हैं। सत्ता की जिम्मेदारी सवालों का जवाब देना होती है—अपमान करना नहीं। यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा और सबसे अहम संदेश है।
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