नई दिल्ली, 10 सितंबर 2025 —
“बेटा, इस बार 90% लाने ही हैं।”
“तू पड़ोस वाले शर्मा जी के बेटे को देख, हर बार टॉप करता है।”
“इतना पढ़ाया, फिर भी ये नंबर आए?”
शायद ही कोई बच्चा हो जिसने ये बातें न सुनी हों। हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा जीवन में सफल हो, लेकिन कभी-कभी सफलता की इस दौड़ में वे अनजाने में अपने ही बच्चों को थका देते हैं — इतना कि कई बार बच्चे ख़तरनाक सोच तक पहुंच जाते हैं।
आज वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे के मौके पर COPE क्लब एमपॉवर के मनोवैज्ञानिक तृषाल वडवाल्कर से हमने बात की — कि कैसे ‘अच्छे नंबर’ का दबाव आज की पीढ़ी को मानसिक रूप से तोड़ रहा है, और कैसे माता-पिता इसमें एक बड़ा फर्क ला सकते हैं।
कॉलेज का समय: आज़ादी नहीं, मानसिक थकावट का दौर?
तृषाल बताते हैं, “कॉलेज का समय अक्सर ‘मौज-मस्ती’ या ‘आज़ादी’ का प्रतीक माना जाता है, लेकिन आज की प्रतिस्पर्धा में ये समय एक अंतहीन रेस बन गया है। छात्र हर वक्त नंबर, इंटर्नशिप, प्लेसमेंट और फ्यूचर की चिंता में घिरे रहते हैं। और जब चीजें उम्मीद के मुताबिक नहीं होतीं — वे खुद को असफल मानने लगते हैं।”
संकेत जो नजरअंदाज हो जाते हैं
- बच्चा शांत हो गया है
- दोस्तों से मिलना-जुलना कम कर दिया
- अचानक पढ़ाई से दूरी बना ली
- बात-बात पर चिढ़चिढ़ा हो रहा है
इन संकेतों को अक्सर ‘मूड स्विंग’ समझकर टाल दिया जाता है, लेकिन हो सकता है बच्चा अंदर से मदद के लिए चिल्ला रहा हो।
मेंटल हेल्थ मार्क्स: ये बात कौन समझाए?
वडवाल्कर कहते हैं, “पैरेंट्स को यह बात रोज़ दोहरानी चाहिए — तुम्हारी मेंटल हेल्थ तुम्हारे नंबरों से कहीं ज़्यादा जरूरी है। बच्चा जब यह महसूस करता है कि उसके प्रयासों को सराहा जा रहा है, भले ही रिज़ल्ट परफेक्ट न हो — तो उसमें आत्मविश्वास आता है।”
बात कीजिए, परखा नहीं
बच्चों को ‘बोलने की आज़ादी’ देना बेहद जरूरी है। तृषाल कहते हैं, “ऐसा माहौल बनाइए जहां बच्चा डरे नहीं, छुपाए नहीं। वह अगर फेल भी हो जाए, तो भी आपके पास आ सके — यह भरोसा सबसे बड़ा सहारा है।”
माता-पिता क्या कर सकते हैं?
- बच्चों की बात ध्यान से सुनें, बिना टोके
- भावनाओं को जज न करें, स्वीकार करें
- ‘तू तो कुछ करता ही नहीं’ जैसी बातें न कहें
- सिर्फ रिज़ल्ट नहीं, प्रयास की सराहना करें
- मेंटल हेल्थ के बारे में खुले में बात करें
एक बार पूछ कर देखिए — “सब ठीक है?”
कभी-कभी सिर्फ एक सवाल, “क्या तुम ठीक हो?” पूरी कहानी खोल सकता है। हो सकता है आपका बच्चा कुछ कहना चाहता हो — बस इंतज़ार कर रहा हो कि कोई सुने, बिना जज किए।
आज के दिन एक संकल्प लें —
अपने बच्चे से सिर्फ नंबरों की नहीं, उसके मन की बात भी कीजिए। क्योंकि सफलता की असली शुरुआत वहीं से होती है — जहां बच्चे को यह एहसास होता है कि वह अकेला नहीं है।
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