आइंस्टीन और उनका चतुर ड्राइवर

आइंस्टीन और उनका चतुर ड्राइवर

यह घटना अल्बर्ट आइंस्टीन के जीवन की एक मज़ेदार और प्रेरणादायक दास्तान है।

एक दिन आइंस्टीन के ड्राइवर ने उनसे कहा—
“सर, आप हर जगह जो भाषण देते हैं, वह मैंने याद कर लिया है। मैं हूबहू वैसे ही बोल सकता हूँ।”

आइंस्टीन मुस्कुराए और बोले—
“अच्छा? तो अगली बार हम दोनों जगह बदल लेंगे। मैं ड्राइवर बन जाऊँगा और तुम मेरी जगह मंच पर भाषण दोगे।”

अगले दिन ऐसा ही हुआ। आइंस्टीन ड्राइवर बनकर गाड़ी चलाते रहे और ड्राइवर मंच पर जा पहुँचा। मंच पर जाकर उसने बिल्कुल आइंस्टीन की तरह भाषण दिया। उसकी वाक्पटुता सुनकर दर्शक झूम उठे और तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूंज गया।

लेकिन तभी एक प्रोफेसर ने हाथ उठाया और एक बेहद जटिल सवाल पूछ डाला। असली आइंस्टीन को लगा—
“अब तो ड्राइवर पकड़ा जाएगा!”

मगर ड्राइवर ने बिना घबराए कहा—
“यह सवाल तो इतना आसान है कि इसका जवाब मेरा ड्राइवर भी दे सकता है। ज़रा उनसे पूछ लीजिए।”

और फिर असली आइंस्टीन ने मुस्कुराते हुए उस कठिन प्रश्न का उत्तर दिया।


सीख

यह छोटी-सी घटना बताती है कि संगति और साथ का बहुत गहरा असर होता है।

अगर आप बुद्धिमानों की संगति में रहते हैं तो आपकी सोच और समझ भी वैसी ही हो जाएगी।

और अगर आप मूर्खों के बीच रहेंगे, तो धीरे-धीरे आपकी बुद्धिमत्ता और दृष्टिकोण भी वैसा ही हो जाएगा।

? यही कारण है कि कहा गया है—
“संगति से गुण आते हैं, संगति से अवगुण।”

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