पटना। बिहार की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी उलटफेर होने के संकेत मिल रहे हैं। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के भीतर असंतोष की आहट तेज होती जा रही है और इसी बीच लालू प्रसाद यादव के दो पुराने सहयोगी—अब भाजपा के कद्दावर नेता—सम्राट चौधरी और रामकृपाल यादव सक्रिय नजर आ रहे हैं। दोनों नेताओं को राजद की संगठनात्मक कमजोरियों और अंदरूनी समीकरणों की गहरी समझ रखने वाला माना जाता है, जिससे पार्टी में संभावित टूट की अटकलें तेज हो गई हैं।
राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक रामकृपाल यादव इस सियासी अभियान में खुलकर भूमिका निभा रहे हैं, जबकि बिहार के उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर्दे के पीछे अहम रणनीति तय कर सकते हैं। सम्राट चौधरी पहले भी राजद में बड़ी बगावत की अगुवाई कर चुके हैं, जिसने पार्टी को भारी नुकसान पहुंचाया था।
11 साल पहले भी टूटा था राजद
फरवरी 2014 में राजद के 13 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ बगावत कर दी थी। उस समय सम्राट चौधरी को इस टूट का मुख्य रणनीतिकार माना गया। लालू यादव के दबाव में नौ विधायक तो वापस लौट आए, लेकिन सम्राट चौधरी समेत तीन विधायक राजद में नहीं लौटे और उन्होंने नीतीश कुमार सरकार को समर्थन दिया। दल-बदल कानून के चलते मई 2014 में इन विधायकों को इस्तीफा देना पड़ा था।
उस दौर में चारा घोटाला मामले में लालू यादव की सजा और जेल यात्रा के बाद पार्टी नेतृत्व को लेकर असमंजस गहराया था, जिसे टूट की बड़ी वजह माना गया।
आज भी हालात मिलते-जुलते
मौजूदा समय में भी राजद लगभग उसी तरह की राजनीतिक परिस्थितियों से गुजर रही है। हालिया चुनावी हार के बाद पार्टी 25 सीटों तक सिमट गई है। पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि कई विधायक अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर असमंजस में हैं।
इधर, नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के विदेश दौरे को लेकर भी पार्टी के अंदर नाराजगी की चर्चा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि असंतोष को समय रहते नहीं संभाला गया, तो राजद में एक बार फिर टूट की स्थिति बन सकती है।
भविष्य की राजनीति पर नजर
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, जब लालू यादव के प्रभावशाली दौर में भी पार्टी में बगावत हो चुकी है, तो वर्तमान परिस्थितियों में इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि विधायकों को सुरक्षित राजनीतिक भविष्य का भरोसा मिला, तो बिहार की राजनीति में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम देखने को मिल सकता है।
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