उद्घाटन के एक साल में ही दम तोड़ गई मुख्यमंत्री की मौजूदगी में बनी योजना

उद्घाटन के एक साल में ही दम तोड़ गई मुख्यमंत्री की मौजूदगी में बनी योजना

नालंदा से सरकारी लापरवाही की एक और शर्मनाक तस्वीर सामने आई है, जहाँ करोड़ों रुपये की लागत से बना एक महत्वाकांक्षी विकास प्रोजेक्ट आज बदहाली का प्रतीक बन चुका है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा बड़े उत्साह के साथ उद्घाटित किया गया ‘सामाजिक उत्थान’ पार्क अब प्रशासनिक उपेक्षा और सिस्टम की उदासीनता की भेंट चढ़ गया है।

नालंदा जिले के सिलाव प्रखंड अंतर्गत नानंद गांव में मनरेगा योजना के तहत लगभग 50 लाख रुपये की लागत से निर्मित यह पार्क आज झाड़ियों, जंगली घास और गंदगी के बीच अपनी दुर्दशा पर “आंसू बहा” रहा है। 21 फरवरी 2025 को मुख्यमंत्री ने अपनी प्रगति यात्रा के दौरान जिस पार्क का उद्घाटन किया था, वह महज एक वर्ष में ही उजाड़ मैदान में तब्दील हो गया है।

पेवर ब्लॉक्स के बीच उगी झाड़ियां, खतरे में ग्रामीण

ग्रामीणों के बैठने, टहलने और सामाजिक आयोजनों के उद्देश्य से बनाए गए इस आधुनिक परिसर में अब पेवर ब्लॉक्स के बीच से झाड़ियां उग आई हैं, जिससे पूरे पार्क का रास्ता अवरुद्ध हो गया है। हालात इतने खराब हैं कि यहां विषैले जीव-जंतुओं के पनपने का खतरा बढ़ गया है। डर के कारण ग्रामीण अब इस पार्क में कदम रखने से भी कतराने लगे हैं। जो पार्क कभी गांव की शोभा बढ़ाने के लिए बनाया गया था, वह आज सरकारी धन की बर्बादी का जीता-जागता उदाहरण बन गया है।

देखरेख के अभाव में बर्बाद होती सरकारी संपत्ति

नानंद पंचायत के मुखिया अरुण कुमार सिन्हा ने प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने बताया कि पार्क के रखरखाव के लिए दो मालियों की व्यवस्था की मांग प्रशासन से की गई थी, लेकिन इस मांग को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। किसी भी प्रकार की देखरेख की व्यवस्था न होने के कारण लाखों रुपये की यह सरकारी संपत्ति धीरे-धीरे बर्बादी की ओर बढ़ गई।

मुखिया ने यह भी आरोप लगाया कि मनरेगा के तहत पार्क के समीप बनाए गए तालाब का भुगतान अब तक लंबित है, जिसके चलते पंचायत के अन्य विकास कार्य भी ठप पड़े हैं।

गोद लिया गया पंचायत, फिर भी बदहाली

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि नानंद पंचायत को जदयू सांसद कौशलेन्द्र कुमार ने गोद ले रखा है। इसके बावजूद एक तथाकथित “आदर्श गांव” में विकास की यह हालत सरकार की निगरानी व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन की गंभीरता पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट्स में शामिल इस योजना का उद्घाटन के महज एक साल के भीतर ही दम तोड़ देना व्यवस्था की असलियत को उजागर करता है।

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