देश में ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। सैकड़ों संगठनों और कर्मचारियों का कहना है कि यदि सांसदों-विधायकों को पेंशन और आजीवन सुविधाएँ मिल सकती हैं, तो फिर सामान्य सरकारी कर्मचारियों को OPS से वंचित क्यों रखा जा रहा है।
कर्मचारियों का तर्क है कि बुढ़ापा सबका आता है—चाहे वह नेता हो या शिक्षक, क्लर्क या पुलिसकर्मी। ऐसे में केवल जनप्रतिनिधियों को सुरक्षित पेंशन देना समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। उनका कहना है कि नई पेंशन योजना (NPS) बाजार आधारित है, जिसमें भविष्य की कोई गारंटी नहीं, जबकि OPS में सेवानिवृत्ति के बाद निश्चित और सम्मानजनक जीवन का भरोसा मिलता है।
कर्मचारी संगठनों ने सवाल उठाया है कि जब एक बार चुने गए जनप्रतिनिधियों को आजीवन पेंशन, भत्ते और सुरक्षा मिल सकती है, तो दशकों तक सेवा देने वाले सरकारी कर्मियों को क्यों नहीं। आंदोलनरत कर्मचारियों की मांग है कि या तो OPS सभी के लिए लागू की जाए, या फिर नेताओं की विशेष पेंशन व्यवस्था पर भी पुनर्विचार हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा अब केवल पेंशन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक न्याय और समान अधिकारों से जुड़ चुका है। आने वाले समय में यह सवाल सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक और नीतिगत चुनौती बन सकता है।
निष्कर्ष:
“समान सेवा—समान सुरक्षा” की मांग के साथ OPS को लेकर आवाज़ और तेज होती जा रही है।
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