अब जन्म से सुनने की समस्या का भी होगा समाधान, एम्स पटना ने पहली बार किया बोन कंडक्शन इम्प्लांट

अब जन्म से सुनने की समस्या का भी होगा समाधान, एम्स पटना ने पहली बार किया बोन कंडक्शन इम्प्लांट

पटना। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), पटना के ईएनटी (नाक, कान एवं गला) विभाग ने चिकित्सा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के डॉक्टरों की टीम ने पहली बार द्विपक्षीय एनोटिया (दोनों कानों के बाहरी हिस्से यानी पिन्ना का जन्मजात अभाव) से पीड़ित एक छोटे बच्चे का सफलतापूर्वक बोन कंडक्शन इम्प्लांट किया है।

यह सर्जरी राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) योजना के तहत की गई, जिसके अंतर्गत बच्चे के उपचार का पूरा खर्च वहन किया गया। इस तकनीक के माध्यम से ऐसे बच्चों को सुनने की क्षमता विकसित करने में मदद मिलती है, जिनके बाहरी और मध्य कान में जन्मजात विकृति होती है, जबकि उनका आंतरिक कान (कॉक्लिया) सामान्य रूप से कार्य करता है। ऐसे बच्चों में गंभीर कंडक्टिव हियरिंग लॉस के कारण भाषा एवं बोलने के विकास में बाधा आती है। बोन कंडक्शन इम्प्लांट ऐसे मामलों में एक प्रभावी उपचार विकल्प है।

इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए ईएनटी विभाग ने RBSK बिहार की डॉ. वीणा, डॉ. अनुराग एवं उनकी पूरी टीम तथा एम्स पटना प्रशासन के सहयोग के प्रति आभार व्यक्त किया। सर्जरी में मार्गदर्शन देने वाले वरिष्ठ सर्जन डॉ. राजेश विश्वकर्मा का भी विशेष योगदान रहा।

इसके अतिरिक्त, ईएनटी विभाग ने दो अन्य जटिल कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी भी सफलतापूर्वक कीं। इनमें एक वयस्क मरीज शामिल था, जो एडवांस्ड ओटोस्क्लेरोसिस से पीड़ित था, जबकि दूसरा बच्चा गंभीर कॉक्लियर विकृति से ग्रसित था। तीनों मरीजों की स्थिति फिलहाल संतोषजनक है और वे स्वस्थ हो रहे हैं।

एम्स पटना का कॉक्लियर एवं हियरिंग इम्प्लांट कार्यक्रम अब 400 इम्प्लांट का महत्वपूर्ण आंकड़ा पार करने की दिशा में अग्रसर है। इस उपलब्धि से संस्थान अब सुनने से संबंधित जटिल से जटिल समस्याओं के उपचार में भी नई संभावनाएं स्थापित कर रहा है।

इस सफलता में ईएनटी विभाग के फैकल्टी सदस्यों, फेलो, रेजिडेंट डॉक्टरों, ऑडियोलॉजिस्ट एवं स्पीच लैंग्वेज थेरेपिस्ट की महत्वपूर्ण भूमिका रही। एम्स पटना प्रशासन के सहयोग से संस्थान ने श्रवण बाधित बच्चों एवं मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है।

यह उपलब्धि न केवल एम्स पटना के लिए गौरव का विषय है, बल्कि जन्मजात श्रवण दोष से पीड़ित बच्चों के बेहतर भविष्य और उनके भाषा एवं संचार विकास की दिशा में भी एक बड़ी उम्मीद है।

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