शराबबंदी से बिहार को हर साल करीब ₹20,000 करोड़ के राजस्व नुकसान की बात खुद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कही है। इसके बावजूद सरकार ने स्पष्ट किया है कि शराबबंदी जारी रहेगी और इसे महिलाओं के सम्मान से जुड़ा फैसला बताया गया है।
लेकिन बिहार के लोगों के बीच एक बड़ा सवाल लगातार उठ रहा है—
अगर शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध है, तो फिर अवैध शराब की बिक्री और सप्लाई क्यों नहीं रुक रही?
हाल के मामलों में बिहार में बड़ी मात्रा में अवैध शराब पकड़ी जा रही है। बांका में हाल ही में करीब ₹1 करोड़ मूल्य की 906 पेटी विदेशी शराब बरामद होने की खबर सामने आई।
वहीं रिपोर्टों में शराब की गुप्त/होम डिलीवरी और कोड वर्ड के जरिए सप्लाई का भी उल्लेख है।
जनता का सवाल:
जब शराब की मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई, सरकार को आबकारी राजस्व भी नहीं मिल रहा और अवैध कारोबार लगातार सामने आ रहा है, तो क्या शराबबंदी की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा जरूरी नहीं है?
क्या बिहार में एक ऐसा मॉडल नहीं हो सकता जिसमें—
➡️ नियंत्रित एवं लाइसेंस प्राप्त बिक्री
➡️ भारी टैक्स
➡️ नशामुक्ति केंद्रों का विस्तार
➡️ अवैध शराब और जहरीली शराब पर कड़ी कार्रवाई
➡️ शराब पीकर वाहन चलाने पर सख्त कार्रवाई
➡️ प्राप्त राजस्व को अस्पताल, शिक्षा और रोजगार में लगाया जाए
NCAER से जुड़े हालिया अध्ययन ने भी शराबबंदी के राजस्व और सामाजिक प्रभाव पर पुनर्विचार की जरूरत का सवाल उठाया है।
आखिर सवाल सिर्फ शराबबंदी रखने या हटाने का नहीं है—सवाल यह है कि बिहार की जनता के लिए कौन-सी नीति ज्यादा सुरक्षित, प्रभावी और आर्थिक रूप से उपयोगी है?
आपकी राय क्या है—शराबबंदी जारी रहनी चाहिए या नियंत्रित शराब बिक्री की व्यवस्था लागू होनी चाहिए?
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