भारत-चीन फिर आ रहे करीब, लेकिन अमेरिका का विकल्प नहीं: मोदी की चीन यात्रा से क्या मिला संकेत

भारत-चीन फिर आ रहे करीब, लेकिन अमेरिका का विकल्प नहीं: मोदी की चीन यात्रा से क्या मिला संकेत

नई दिल्ली/बीजिंग। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति में चर्चा छेड़ दी है। मोदी शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने चीन पहुंचे, जहां उन्होंने रूस और चीन के नेताओं के साथ मुलाकात की। इस यात्रा का मकसद चीन के साथ संबंधों को बहाल करना, अमेरिका को खास संदेश देना और घरेलू राजनीति में रणनीतिक स्वायत्तता का प्रदर्शन करना था।

मोदी की चीन यात्रा के तीन बड़े मकसद

1. भारत-चीन संबंध सामान्य करना –

पिछले साल से दोनों देशों के बीच संवाद की प्रक्रिया शुरू हुई थी, जिसे इस यात्रा ने और गति दी। भारत और चीन दोनों ही रणनीतिक और आर्थिक विकल्पों को बढ़ाना चाहते हैं।

2. दुनिया को खास संदेश देना –

मोदी ने ट्रंप प्रशासन और दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश की कि भारत अपनी विदेश नीति खुद तय करेगा। पुतिन और शी जिनपिंग के साथ उनकी तस्वीरें काफी चर्चा में रहीं।

3. रणनीतिक स्वायत्तता दिखाना –

मोदी सरकार ने इस यात्रा के जरिए यह साबित करना चाहा कि भारत अमेरिका के दबाव में नहीं है। “रणनीतिक स्वायत्तता” शब्द का इस्तेमाल कर यह दिखाया गया कि भारत अपने फैसले स्वतंत्र रूप से लेता है।

भारत के सामने खतरे भी

हालांकि इस यात्रा के कुछ खतरे भी हैं। यूरोप भारत-रूस निकटता को संदेह की नजर से देख सकता है। वहीं, अमेरिका की नीति भी अप्रत्याशित है और किसी भी समय बदल सकती है। इसके बावजूद मोदी सरकार ने इन जोखिमों को उठाने का फैसला किया।

निष्कर्ष

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत, चीन और रूस मिलकर अमेरिका की जगह नहीं ले सकते। यह यात्रा भारत की विदेश नीति में लचीलापन और विकल्पों की तलाश का हिस्सा थी, न कि अमेरिका को छोड़कर नए ध्रुव की तरफ झुकाव।

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