बिहार की सत्ता में एक बार फिर हलचल तेज है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक भविष्य को लेकर विपक्ष ही नहीं, राजनीतिक विश्लेषक भी संशय में हैं। वजह—नीतीश की वही पुरानी ‘यू-टर्न’ वाली छवि, जो आज भी राजनीतिक गलियारों में बहस का सबसे बड़ा आधार बनी हुई है। हालांकि 2024 के बाद से नीतीश कुमार बार-बार सार्वजनिक मंचों पर यह आश्वासन देते रहे हैं कि वे अब पिछली “गलती नहीं दोहराएंगे”, लेकिन उनकी साफगोई के बावजूद लोगों का भरोसा पूरी तरह लौट नहीं सका है। कभी “मरते दम तक एनडीए नहीं छोड़ने” की घोषणा करने वाले नीतीश उसके बाद भी पाला बदल चुके हैं—यही इतिहास सवालों को फिर जिंदा कर देता है।
नए जोड़-घटाव से नई हलचल
बिहार विधानसभा में संभावित समीकरणों का नया फार्मूला—85+35+6 = 126 सीटें—एक नए खेमे की संभावना दिखाता है। वहीं 89+19+4+5 = 117 सीटों वाला दूसरा गठजोड़ भी चर्चा में है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिहार की राजनीति में कभी भी कोई समीकरण स्थाई नहीं होता। दोस्त और दुश्मन की रेखाएं यहां अक्सर धुंधली हो जाती हैं—क्योंकि राजनीति में न दोस्त स्थाई होते हैं, न दुश्मन।
नीतीश कुमार: ‘नंबर वन’ की कुर्सी पर लगातार कायम
सालों से बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार खुद को नंबर वन की कुर्सी पर बनाए हुए हैं। चाहे साथियों की ताकत उनसे अधिक रही हो, पर मुख्यमंत्री की कुर्सी अधिकतर उन्होंने ही संभाली। भाजपा से लेकर आरजेडी तक—हर गठबंधन में नीतीश ने अपना वर्चस्व स्थापित रखा है।
भाजपा का इतिहास गवाह है कि 2005 से 2015 तक वह जेडीयू की सहयोगी रही और कभी नेतृत्व को लेकर टकराव की स्थिति नहीं आने दी। आज भी सीटों के लिहाज से भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है—फिर भी मुख्यमंत्री की कुर्सी जेडीयू नेता नीतीश के पास है।
भाजपा की ‘तरजीह’ की राजनीति
भाजपा ने हमेशा नीतीश को सम्मानजनक जगह दी।
तब भी, जब जेडीयू लोकसभा में सिर्फ 2 सांसदों वाली पार्टी थी
तब भी, जब भाजपा ने अपनी जीती 22 सीटों में से 5 सीटें जेडीयू के लिए छोड़ दीं
और विधानसभा चुनावों में 2020 तक उनके नेतृत्व को स्वीकार किया
2024 लोकसभा चुनाव में जरूर भाजपा ने 17 और जेडीयू को 16 सीटें रखीं—लेकिन इसके अलावा भाजपा हमेशा नीतीश को बराबरी या बढ़त पर रखती रही है।
भाजपा ने वादा निभाया, नेतृत्व नीतीश को सौंपा
भाजपा ने पहले ही घोषित कर दिया था कि बिहार विधानसभा चुनाव एनडीए नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ेगा। नतीजे आने के बाद भाजपा ने बिना किसी विवाद के मुख्यमंत्री की कुर्सी नीतीश को दे दी।
गृह विभाग और स्पीकर को लेकर भी भाजपा और जेडीयू में सहमति बन गई—जबकि अंदेशा था कि यही मुद्दे टकराव का कारण बनेंगे। लेकिन सब कुछ सहजता से सुलझ गया।
राजनीतिक गलियारों में इसे भाजपा का ‘गठबंधन धर्म’ निभाने का उदाहरण माना जा रहा है।
निष्कर्ष
नीतीश कुमार की राजनीति पर संदेह इसलिए बरकरार है क्योंकि उनका इतिहास बेहद जटिल है। लेकिन मौजूदा हालात बताते हैं कि बीजेपी और जेडीयू के बीच इस समय सब कुछ सहज दिख रहा है।
अब देखने वाली बात यह है कि बिहार की राजनीति के इस जोड़-घटाव के दौर में नीतीश कितने स्थिर रहते हैं—और क्या जनता और राजनीतिक वर्ग उनके इस नए दौर पर भरोसा कर पाएगा।
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