नवादा। बिहार की राजनीति एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है, जब नवादा विधानसभा सीट से एक ऐसी उम्मीदवार ने जीत दर्ज की है, जिसे शपथ ग्रहण के दौरान हलफनामे के शब्द तक सही ढंग से पढ़ने में कठिनाई हुई। विधायक के रूप में चुनी गई यह महिला एक बाहुबली नेता की पत्नी बताई जाती हैं, और इसी कारण यह जीत अब सवालों के घेरे में है—क्या वजूद योग्यता का है या फिर सत्ता के साये का?
क्षेत्र के लोगों का आरोप है कि पढ़े-लिखे और सक्षम उम्मीदवारों को बार-बार जनता नकार देती है। उदाहरण के तौर पर, वरिष्ठ और शिक्षित नेता के.सी. सिन्हा, जिन्होंने पूरी तैयारी और विकास के वादों के साथ चुनाव लड़ा, उन्हें जनता ने चुनने से इनकार कर दिया। अररिया में चर्चित आईपीएस अधिकारी रहे शिवदीप लांडे मैदान में उतरे, लेकिन जनता ने उन्हें भी हार का सामना करवाया। ऐसी घटनाएँ यह सवाल उठाती हैं कि आखिर बिहार के मतदाता किस आधार पर उम्मीदवार चुन रहे हैं—काम, शिक्षा, ईमानदारी या सिर्फ जाति, प्रभाव और दबदबा?
नवादा में जीती बाहुबली की पत्नी को जब विधानसभा में शपथ दिलाई गई तो वे शपथ-पत्र भी सही से नहीं पढ़ सकीं। कई बार उन्हें रुकना पड़ा, और प्रोटेम स्पीकर की मदद से पूरा शपथ पढ़वाया गया। यह दृश्य सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से वायरल हुआ और बिहार की राजनीति पर तीखे तंज भी सुनाई दिए।
जितनी अयोग्य जनता होगी, उससे सौ गुना अयोग्य नेता पैदा होंगे
आलोचकों का कहना है कि जब जनता वोट देने के पहले सोच-समझकर निर्णय नहीं लेती, तब ऐसे ही नतीजे सामने आते हैं। लोगों का तर्क है कि “जितनी अयोग्य जनता होगी, उससे सौ गुना अयोग्य नेता पैदा होंगे।” बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा का गिरता स्तर और राजनीतिक प्रभाव—ये सभी कारक मिलकर बिहार की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर रहे हैं।
नवादा के स्थानीय नागरिकों का दर्द साफ दिखता है। उनका कहना है कि वे विकास चाहते भी हैं, मगर सही उम्मीदवारों को चुनने में बार-बार चूक जाते हैं। बाहुबली छवि, जातीय समीकरण और पैसों का खेल लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है। युवा वर्ग विशेष रूप से निराश है कि जब राज्य में इतने पढ़े-लिखे उम्मीदवार होते हुए भी जनता अनपढ़ या प्रभावशाली परिवारों के लोगों को जिताती है, तब अच्छे नेतृत्व की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
वहीं दूसरी ओर, कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह भी कहते हैं कि केवल उम्मीदवार को दोष देने से काम नहीं चलेगा। लोकतंत्र में जीत जनता तय करती है, और जब तक लोगों में राजनीतिक जागरूकता, शिक्षा और सही-गलत के बीच फर्क करने की क्षमता नहीं बढ़ेगी, तब तक बदलाव की उम्मीद करना मुश्किल है।
बिहार में बेरोजगारी, अपराध और विकास की कमी पहले से ही चिंता का विषय हैं। अब अनपढ़ प्रतिनिधियों के विधानसभा तक पहुँचने से यह बहस और गहरा गई है कि क्या ऐसे नेता प्रदेश को सही दिशा दे पाएंगे?
नवादा की यह घटना सिर्फ एक सीट की कहानी नहीं है—यह पूरे बिहार की उस राजनीतिक मानसिकता की तस्वीर है, जिसे समझना और बदलना अब बेहद जरूरी हो गया है।
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