बिहार की राजनीति में बड़ा मोड़, जहां दशकों से चली आ रही “बड़ा भाई-छोटा भाई” की राजनीति अब इतिहास बनने की ओर बढ़ रही है। 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए (NDA) ने एक ऐसा संतुलन दिखाया है, जिसने सबको चौंका दिया। BJP और JDU – दोनों को 101-101 सीटें देकर गठबंधन ने यह साफ संकेत दे दिया है कि अब न कोई ‘बड़ा भाई’ होगा और न ‘छोटा भाई’।
सीटों का बराबर बंटवारा: एक नई राजनीतिक समझदारी
2020 के चुनाव में जहां BJP ने JDU से अधिक सीटें जीती थीं और खुद को ‘बड़ा भाई’ साबित किया था, वहीं इस बार चुनाव पूर्व ही बराबरी का फॉर्मूला लागू कर दिया गया।
243 सदस्यीय विधानसभा में से 101 सीटें BJP को, 101 सीटें JDU को, और बाकी की 41 सीटें अन्य सहयोगी दलों (जैसे HAM, VIP, RLSP आदि) को दी गईं।
इस सीट बंटवारे ने ना सिर्फ दोनों प्रमुख दलों के बीच संतुलन बैठाया है, बल्कि सार्वजनिक रूप से यह संदेश भी दिया कि NDA में अब ‘बदलते बिहार’ की राजनीतिक सोच हावी है – जहां अहंकार नहीं, सहयोग ही शक्ति है।
लेकिन यहीं छिपा है असली पेच!
हालांकि यह “बराबरी का बंटवारा” देखने में तो एक परिपक्व राजनीतिक समझौता लगता है, लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि असली खेल चुनाव नतीजों के बाद शुरू होगा।
यदि BJP को ज्यादा सीटें मिलती हैं?
तो क्या वह फिर से मुख्यमंत्री पद पर दावा ठोकेगी?
क्या वह JDU के साथ वैसी ही स्थिति बनाए रखेगी जैसी 2020 में बनाई थी?
अगर JDU को बढ़त मिलती है?
तो नीतीश कुमार क्या फिर एक बार सीएम पद की ओर बढ़ेंगे?
या फिर BJP से समर्थन वापसी का रास्ता अपनाएंगे, जैसा उन्होंने अतीत में किया?
राजनीति के जानकार क्या कह रहे हैं?
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. आर.के. मिश्रा कहते हैं,
“बराबरी का सीट बंटवारा सिर्फ सतही मेल है, अंदरूनी खिंचाव अभी भी बरकरार है। चुनाव परिणाम के बाद ये गठबंधन टिकेगा या फिर से टूटा हुआ इतिहास दोहराएगा, ये देखना बाकी है।”
वहीं वरिष्ठ पत्रकार नीलिमा सिंह का मानना है,
“NDA ने दिखाया है कि वो बदलाव के लिए तैयार है। लेकिन चुनावी राजनीति में नंबर गेम ही सब कुछ तय करता है – सीटें बराबर दी गई हैं, पर असली ताकत तो वोटों और जीत में है।”
क्या कहता है जनता का मूड?
ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी वोटर्स तक में इस बार NDA की रणनीति को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया देखी जा रही है।
कई लोग इसे “समानता की राजनीति” कह रहे हैं, तो कुछ इसे “समझौते की मजबूरी” मानते हैं।
निष्कर्ष:
NDA में ‘बड़ा-छोटा भाई’ की राजनीति खत्म होने का दावा जरूर किया गया है, लेकिन यह सिर्फ चुनावी तस्वीर का एक पहलू है।
असली चुनौती चुनाव के बाद सत्ता की चाबी किसके हाथ में होगी, यही तय करेगा कि वाकई ‘बराबरी’ सिर्फ कागज़ पर थी या सत्ता की कुर्सी तक भी पहुंचेगी।
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