बिहार के सरकारी दस्तावेजों में भूमिहार ब्राह्मण जाति के नामकरण को लेकर बना संशय अब तक दूर नहीं हो सका है। इस मुद्दे पर सवर्ण आयोग की दो बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन किसी ठोस निर्णय पर सहमति नहीं बन पाई है। अब सभी की निगाहें आयोग की प्रस्तावित तीसरी बैठक पर टिकी हैं, जहां यह तय होना है कि सरकारी अभिलेखों में ‘भूमिहार’ लिखा जाए या ‘भूमिहार ब्राह्मण’।
दरअसल, सरकारी कागजातों में केवल भूमिहार लिखे जाने पर समाज के विभिन्न संगठनों ने आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका तर्क है कि भूमिहार ब्राह्मण, ब्राह्मण समाज की ही एक शाखा हैं और उन्हें अयाचक ब्राह्मणों की श्रेणी में गिना जाता है, ऐसे में सरकारी दस्तावेजों में उन्हें भूमिहार ब्राह्मण के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए।
इसी विवाद के मद्देनज़र बिहार के सामान्य प्रशासन विभाग ने 10 अक्टूबर 2025 को सवर्ण आयोग को पत्र लिखकर यह मार्गदर्शन मांगा था कि सरकारी कागजातों में भूमिहार की जगह भूमिहार ब्राह्मण का प्रयोग किया जाए या नहीं। इसके बाद सवर्ण आयोग में 21 नवंबर और 8 दिसंबर को दो बैठकें हुईं, लेकिन दोनों ही बैठकों में कोई अंतिम फैसला नहीं हो सका।
इस बीच यह चर्चा भी सामने आई कि सवर्ण आयोग के भीतर इस मुद्दे को लेकर मतभेद हैं। हालांकि आयोग के अध्यक्ष महाचंद्र सिंह ने इन खबरों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि आयोग में किसी तरह का विवाद नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जैसे ही सभी पक्षों के तथ्य और प्रमाण सामने आएंगे, उन पर चर्चा होना स्वाभाविक है, लेकिन इसे विवाद कहना गलत होगा।
तीसरी बैठक पर टिकी निगाहें
अगर सवर्ण आयोग की तीसरी बैठक में भी भूमिहार या भूमिहार ब्राह्मण के नामकरण पर सहमति नहीं बनती है, तो मामला राज्य सरकार के पाले में चला जाएगा। ऐसी स्थिति में आयोग की भूमिका केवल सिफारिश तक सीमित रह जाएगी और अंतिम निर्णय बिहार सरकार को ही लेना होगा।
पक्ष और विपक्ष के तर्क
सामान्य प्रशासन विभाग के पत्र के बाद आयोग ने दोनों पक्षों से अपने-अपने दावे के समर्थन में साक्ष्य मांगे थे, जिन्हें प्रस्तुत कर दिया गया है।
समर्थन में तर्क
1931 की जनगणना में जाति का उल्लेख भूमिहार ब्राह्मण के रूप में किया गया है।
पुराने भूमि और राजस्व दस्तावेजों में भी भूमिहार ब्राह्मण शब्द का प्रयोग मिलता है।
विरोध में तर्क
भूमिहारों का पारंपरिक पेशा पुरोहिताई नहीं, बल्कि मुख्य रूप से खेती-बाड़ी रहा है।
जनेऊ संस्कार बचपन में नहीं, बल्कि विवाह के समय किया जाता है।
अंतिम फैसला सरकार के हाथ
इस पूरे मसले पर आयोग अध्यक्ष महाचंद्र सिंह ने कहा कि सवर्ण आयोग का मुख्य उद्देश्य पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण वर्गों के लिए नीति तैयार कर सरकार तक पहुंचाना है। अंतिम निर्णय लेने का अधिकार राज्य सरकार के पास ही है। अब देखना होगा कि तीसरी बैठक में कोई सहमति बनती है या फिर यह मामला सीधे सरकार के फैसले पर छोड़ दिया जाता है।
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