नेपाल एक बार फिर राजनीतिक उथल-पुथल के केंद्र में है।
9 सितंबर की रात देश की राजधानी काठमांडू में माहौल बेहद तनावपूर्ण था — सरकारी इमारतें जल रही थीं, अफ़वाहें उड़ रही थीं, और देश की सबसे बड़ी बहस यही थी:
➡️ “क्या नेपाल फिर से राजशाही की ओर बढ़ रहा है?”
क्या हुआ उस रात?
काठमांडू के वरिष्ठ पत्रकार किशोर नेपाल के अनुसार, राजधानी में हिंसा और अराजकता के बीच सेना प्रमुख ने राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल से इस्तीफ़ा देने की मांग की थी। उनका दावा है कि:
“राष्ट्रपति को कहा गया था कि इस्तीफ़ा दीजिए, बाक़ी हम देख लेंगे। पर उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया – ‘चाहे मेरी हत्या कर दो, मैं इस्तीफ़ा नहीं दूँगा’।”
राष्ट्रपति ने ऐसा कहकर न केवल संविधान की गरिमा बचाई, बल्कि देश को सैन्य शासन या राजशाही की संभावित वापसी से भी रोक दिया।
रॉयल पैलेस नारायणहिटी क्यों चर्चा में है?
जब काठमांडू में संसद, सुप्रीम कोर्ट और कई मंत्रालय जल रहे थे, तब एक जगह संपूर्ण सुरक्षित थी — नारायणहिटी दरबार (Royal Palace)।
यह वही जगह है जहां से कभी राजा ज्ञानेंद्र शासन करते थे।
प्रसिद्ध पत्रकार कनक मणि दीक्षित कहते हैं:
“सभी लोकतांत्रिक संस्थानों को टारगेट किया गया, लेकिन रॉयल पैलेस को कोई छूता तक नहीं। इससे यह शक मज़बूत होता है कि कहीं कोई योजना तो नहीं थी?”
राष्ट्रपति बनाम सेना: टकराव या समझदारी?
जहां एक ओर किशोर नेपाल कहते हैं कि सेना ने राष्ट्रपति को हटाने की कोशिश की, वहीं पूर्व मेजर जनरल बिनोज बस्नेत का मानना है कि:
“राष्ट्रपति और सेना प्रमुख ने मिलकर रास्ता निकाला। आर्मी सिर्फ़ तब आती है जब सिविल प्रशासन विफल हो जाए।”
वहीं, राजनीति के जानकार सीके लाल कहते हैं:
“पौडेल दबाव में थे, लेकिन उन्होंने संसद भंग करने का फैसला खुद नहीं लिया। उन्होंने अंतरिम प्रधानमंत्री की सिफारिश पर चुनाव की घोषणा कर दी – ताकि आरोप उनके सिर न आएं।”
प्रधानमंत्री ओली का इस्तीफ़ा भी दबाव में?
बीबीसी से बात करते हुए एक सूत्र ने खुलासा किया कि:
“प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने भी सेना के कहने पर ही इस्तीफ़ा दिया। अगर राष्ट्रपति ने भी इस्तीफ़ा दे दिया होता, तो नेपाल एक बार फिर या तो सैन्य शासन में चला जाता या राजशाही का रास्ता खुल जाता।”
नेपाल किस दिशा में जा रहा है?
नेपाल के राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि:
- नेपाल एक संवैधानिक संकट के कगार पर था।
- राष्ट्रपति के इंकार ने सिस्टम को अस्थायी तौर पर बचा लिया, लेकिन संकट अभी पूरी तरह टला नहीं है।
- राजशाही के संकेत अभी भी मौजूद हैं और जनता में गहरा असंतोष बना हुआ है।
क्या वाकई लौट रही है राजशाही?
हालांकि कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन:
- सोशल मीडिया पर “राजा आऊ, देश बचाऊ” जैसे नारे ट्रेंड कर रहे हैं।
- नारायणहिटी पैलेस की सुरक्षा अचानक बढ़ा दी गई है।
- ज्ञानेंद्र शाह के समर्थकों की गतिविधियाँ तेज़ हो गई हैं।
निष्कर्ष: क्या लोकतंत्र को बचा पाए राष्ट्रपति?
राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने एक बेहद कठिन निर्णय लेकर देश को उस रात संभावित तख्तापलट से बचा लिया।
लेकिन:
- क्या ये स्थायी समाधान है या महज़ एक अस्थायी राहत?
- क्या सेना वाकई लोकतंत्र के साथ खड़ी है या सिर्फ़ रणनीतिक चुप्पी में है?
- और सबसे अहम, क्या नेपाल की जनता अब भी लोकतंत्र में विश्वास रखती है?
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