बिहार की राजनीति फिर उसी पुराने मोड़ पर खड़ी है जहाँ सत्ता की चाबी भले ही भाजपा के पास पहुँचती दिख रही हो, मगर ताला खोलने की चाबी अब भी नीतीश कुमार के हाथ में है। एग्जिट पोल्स में एनडीए की बढ़त दिख रही है, लेकिन बिहार भाजपा के लिए यह “मीठी जीत” शायद उतनी संतोषजनक नहीं होगी। वजह — भाजपा के पास अब भी अपना मुख्यमंत्री चेहरा नहीं है।
2015 में नीतीश विहीन एनडीए को बिहार की 243 सीटों में से सिर्फ 53 पर जीत मिली थी। तब भाजपा के चेहरे सुशील मोदी थे, लेकिन करिश्माई जनाधार का अभाव पार्टी को भारी पड़ा। 2014 में नरेंद्र मोदी की आंधी से देश बदल गया, मगर बिहार में भाजपा का भाग्य नहीं पलटा।
नीतीश कुमार ने 2015 में भाजपा से नाता तोड़ा और लालू यादव के दो बेटों तेज प्रताप और तेजस्वी के साथ शपथ ली — और यही मोड़ बिहार की राजनीति की दिशा बदल गया। वर्षों बाद भाजपा दोबारा नीतीश के साथ लौटी, मगर इस बार “छोटे भाई” के रोल में।
2020 में भाजपा ने जदयू से ज्यादा सीटें जीतीं (74 बनाम 43), पर मुख्यमंत्री फिर भी नीतीश ही बने। आज भी हालात लगभग वही हैं — सबसे ताकतवर संगठन, पर बिना चेहरे की पार्टी।
भाजपा के पास न तो सुशील मोदी के बाद कोई सर्वमान्य नेता बचा है, न ही सम्राट चौधरी जैसे नए चेहरों को वह भरोसेमंद “मुख्यमंत्री मैटेरियल” के रूप में पेश कर पा रही है। पार्टी में भीतरखाने यह असमंजस साफ झलकता है कि नीतीश के बाद “कौन?”
दूसरी तरफ तेजस्वी यादव ने अपने पिता लालू प्रसाद का राजनीतिक उत्तराधिकार पूरी मजबूती से संभाल लिया है। हर सर्वे में उनका नाम “मुख्यमंत्री फेस” के रूप में उभरता है — और यही बात उन्हें भाजपा से अलग करती है।
एग्जिट पोल सही निकले तो यह साफ हो जाएगा कि बिहार में जनता ने नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव — दोनों में से किस चेहरे पर भरोसा जताया है। लेकिन भाजपा के लिए सवाल अब भी वही रहेगा — “कब तक उधार के चेहरे से चुनाव जीतेगी?”
अगर परिणाम एनडीए के पक्ष में भी आए, तो भी बिहार भाजपा के लिए यह “जीत में छिपी हार” जैसी स्थिति होगी। क्योंकि मुख्यमंत्री की कुर्सी भले पास में हो, मगर उस पर बैठने वाला चेहरा आज भी उसका अपना नहीं।
और ऐसे में, शाहरुख खान की मशहूर लाइन याद आ जाती है —
“हारकर जीतने वाले को बाज़ीगर कहते हैं…”
लेकिन बिहार में जनता पूछ सकती है —
“जीतकर हारने वाले को क्या कहते हैं? भाजपा!”
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