फिलिस्तीन-इजरायल संकट पर भारत की विदेश नीति में बदलाव के संकेत, UN में फिलिस्तीन के पक्ष में वोट

फिलिस्तीन-इजरायल संकट पर भारत की विदेश नीति में बदलाव के संकेत, UN में फिलिस्तीन के पक्ष में वोट

नई दिल्ली।
महात्मा गांधी ने 26 नवंबर 1938 को हरिजन पत्रिका में लिखा था कि “फिलिस्तीन अरबों के लिए वैसा ही है, जैसा इंग्लैंड अंग्रेजों के लिए और फ्रांस फ्रेंच लोगों के लिए।” स्वतंत्रता के बाद पंडित नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन के बंटवारे का विरोध किया था। उस दौर से लेकर अब तक भारत की विदेश नीति ने कई पड़ाव देखे हैं।

बीते दिनों हुए घटनाक्रम ने इस नीति में नया मोड़ ला दिया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में भारत ने फिलिस्तीन को अलग राज्य का दर्जा देने से जुड़े न्यूयॉर्क घोषणा के पक्ष में वोट दिया और दोहा पर हुए इजरायली हमले की निंदा की। इसे भारत के पुराने रुख—फिलिस्तीन समर्थक नीति—की ओर लौटने के संकेत माना जा रहा है।

7 अक्टूबर के बाद उठे सवाल

7 अक्टूबर 2023 को हमास के इजरायल पर हमले को भारत ने आतंकवादी हमला करार दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरुआती बयानों में इजरायल के साथ मजबूती से खड़े होने की बात कही, लेकिन फिलिस्तीन का उल्लेख नहीं किया। इसके बाद 27 अक्टूबर 2023 को UNGA में तत्काल सीजफायर प्रस्ताव पर भारत ने मतदान से दूरी बनाई। बीते तीन वर्षों में भारत ने गाजा संघर्ष से जुड़े मानवीय प्रस्तावों पर चार बार एब्सटेन किया, जिससे विदेश नीति में झुकाव का आभास हुआ।

इजरायल से बढ़ते रिश्ते

पिछले एक दशक में भारत-इजरायल संबंध और गहरे हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी की 2017 की इजरायल यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच कृषि, तकनीक, जल प्रबंधन और रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ा। 2018 में मोदी फिलिस्तीन भी गए, लेकिन वहां उन्होंने “स्वतंत्र और संप्रभु” फिलिस्तीन की बात की, “अखंड” शब्द का प्रयोग नहीं किया। यह बदलाव विपक्ष और जानकारों की नजरों से नहीं बचा।

गाजा संकट और अंतरराष्ट्रीय दबाव

गाजा में हालिया इजरायली कार्रवाई ने गंभीर मानवीय संकट खड़ा कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र आयोग ने इसे नरसंहार की संज्ञा दी। गाजा में भुखमरी की भयावह तस्वीरों ने वैश्विक दबाव बढ़ा दिया है। फ्रांस समेत कई यूरोपीय देशों ने फिलिस्तीन को मान्यता देने की घोषणा की है। ऐसे माहौल में भारत के लिए भी अपनी नैतिक और वैचारिक प्रतिबद्धता की ओर लौटना अनिवार्य हो गया।

पुराना रुख, नई परिस्थिति

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत का UNGA में फिलिस्तीन के पक्ष में खड़ा होना उसी नैतिक-वैचारिक धरातल की वापसी है, जिसे दशकों तक भारत की विदेश नीति का आधार माना गया। विदेश मंत्री पहले ही संसद में स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत “टू स्टेट सॉल्यूशन” (दो राष्ट्र समाधान) का समर्थक है।

कुल मिलाकर, हालिया घटनाक्रम भारत की विदेश नीति में डिप्लोमैटिक बैलेंस शिफ्ट की ओर इशारा कर रहे हैं—जहां एक ओर इजरायल के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग जारी रहेगा, वहीं दूसरी ओर फिलिस्तीन के पक्ष में ऐतिहासिक और वैचारिक प्रतिबद्धता दोबारा सामने आ रही है।

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