झारखंड की लोकसंस्कृति में कर्मा पूजा का विशेष महत्व है। यह पर्व भाई-बहन, परिवार और समाज के सामूहिक प्रेम, एकता और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है।
? पूजा का महत्वकर्मा पूजा का नाम ‘कर्म वृक्ष’ (कदंब/करम का पेड़) से जुड़ा है। माना जाता है कि इस वृक्ष में जीवन और उर्वरता का आशीर्वाद निहित है। पूजा के दौरान करम डाली (शाखा) को गांव के बीच लाकर स्थापित किया जाता है और उसी की पूजा होती है।

? पूजा की परंपरामहिलाएँ और लड़कियाँ उपवास रखकर भाई और परिवार की लंबी उम्र की कामना करती हैं।गाँव के युवक-युवतियाँ एकत्र होकर करम गीत गाते और नृत्य करते हैं।करम डाली को खेतों और जलस्रोतों से लाकर पूजा स्थल पर गाड़ा जाता है।पूजा के दौरान धान, जौ, अरवा चावल और दूध-दही अर्पित किए जाते हैं।
? लोकगीत और नृत्यरात भर गांव में ढोल-मांदर की थाप गूंजती है और युवक-युवतियाँ पारंपरिक गीतों पर नृत्य करते हैं। गीतों में भाई-बहन का प्रेम, फसल की समृद्धि और प्रकृति की महिमा का वर्णन मिलता है।
? कृषि और प्रकृति से जुड़ावयह पर्व खेती-किसानी और हरियाली का त्योहार है। किसान मानते हैं कि करम देवता की पूजा से खेतों में पैदावार अच्छी होती है और परिवार सुख-समृद्ध रहता है।
? सामूहिक उत्सवकर्मा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सामाजिक मेलजोल और एकजुटता का उत्सव है। इसमें पूरा गांव शामिल होता है और यह झारखंड की सामूहिक संस्कृति की झलक दिखाता है।
? संक्षेप में, कर्मा पूजा झारखंड की पहचान है—जहाँ भाई-बहन का प्रेम, परिवार की खुशहाली, प्रकृति का आदर और सामूहिक एकजुटता एक साथ झलकती है।
करमा पूजा किस भगवान की होती है?
करम उत्सव करम (बोलचाल की भाषा में कर्मा ) एक आदिवासी फसल उत्सव है जो झारखंड , बिहार (बिहार का मगध क्षेत्र), पश्चिम बंगाल , छत्तीसगढ़ , असम , ओडिशा और बांग्लादेश जैसे भारतीय राज्यों में मनाया जाता है। यह शक्ति, यौवन और यौवन के देवता, करम-देवता की पूजा को समर्पित है।
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