पटना: जैसे-जैसे बिहार में चुनावी घड़ी नज़दीक आ रही है, वैसे-वैसे सियासी पारा आसमान छूने लगा है। एक ओर NDA ने अपनी रणनीतिक बढ़त दिखाते हुए सीट शेयरिंग को लेकर स्पष्ट संकेत दे दिए हैं, वहीं महागठबंधन में अब हर तरफ से दरारें नजर आने लगी हैं। राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा आम है कि महागठबंधन भीतरखाने से टूट की कगार पर है — और इसकी सबसे बड़ी वजह है टिकट बंटवारे को लेकर मचा बवाल।
वीआईपी के ‘डॉक्टर’ दिल्ली में
वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी का बयान, “महागठबंधन का स्वास्थ्य खराब है, इलाज कराने दिल्ली जा रहा हूं,” खुद बयां कर रहा है कि हालात कितने बिगड़ चुके हैं। इधर पशुपति पारस ने भी चेतावनी दी है कि यदि सीटों पर सहमति नहीं बनी, तो वे अकेले चुनाव लड़ेंगे।
कांग्रेस का ‘अब या कभी नहीं’ अल्टीमेटम
बिहार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता — राजेश राम, कृष्णा अल्लावरु, शकील अहमद खान, और मदन मोहन झा — दिल्ली कूच कर चुके हैं। सूत्रों की मानें तो कांग्रेस ने तेजस्वी यादव को साफ कह दिया है कि “पहले वीआईपी का मुद्दा सुलझाओ, फिर दिल्ली आओ।” इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि पहले चरण के चुनाव में अब बहुत कम वक्त बचा है।
लालू ने बांटे, तेजस्वी ने छीने टिकट!
सबसे चौंकाने वाला घटनाक्रम RJD में देखने को मिला, जब लालू प्रसाद यादव ने कई दावेदारों को चुनावी सिंबल बांटे, जिससे उनके आवास पर भारी भीड़ उमड़ पड़ी। लेकिन दिल्ली से लौटते ही तेजस्वी यादव ने पूरे समीकरण पलट दिए। सूत्रों के अनुसार, उन्होंने सभी सिंबलधारियों को रात में राबड़ी आवास तलब कर उनसे सिंबल वापस ले लिए।
अब सवाल ये हैं:
- क्या कांग्रेस लालू यादव की कार्यशैली से नाराज़ है?
- क्या तेजस्वी यादव पर गठबंधन बचाने का दबाव बन गया है?
- और सबसे अहम — क्या महागठबंधन टिकेगा या NDA की रणनीति इसे तोड़ देगी?
बिहार की सियासत अब एक नाजुक मोड़ पर खड़ी है, जहां हर फैसला चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकता है। महागठबंधन में अब सिर्फ सीटों की नहीं, भरोसे की भी लड़ाई छिड़ चुकी है।
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