बिहार चुनाव में सियासी तूफ़ान, महिला रोजगार योजना पर चुनाव आयोग की चुप्पी ने बढ़ाया विवाद,

बिहार चुनाव में सियासी तूफ़ान, महिला रोजगार योजना पर चुनाव आयोग की चुप्पी ने बढ़ाया विवाद,

पटना: बिहार विधानसभा चुनाव के बीच मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना पर चुनाव आयोग की चुप्पी ने सियासी हलचल तेज कर दी है। मुख्यमंत्री द्वारा चलाई जा रही इस योजना के तहत महिलाओं को 10 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी जा रही है — लेकिन विपक्षी दलों का आरोप है कि यह आचार संहिता का उल्लंघन है।

गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने अतीत में तमिलनाडु में इसी तरह की परिस्थितियों में कल्याणकारी योजनाओं पर रोक लगाई थी। 2004 में AIADMK सरकार की किसानों को नकद सहायता योजना और 2006 में DMK की मुफ्त कलर टीवी योजना पर आयोग ने रोक लगाई थी, लेकिन बिहार में वही नीति लागू नहीं की गई, जिससे आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।

बिहार में जारी रही 10,000 वाली योजना

जानकारी के मुताबिक, 26 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना की शुरुआत की थी, जिसके तहत 75 लाख महिलाओं को 10 हजार रुपये देने का लक्ष्य रखा गया था। यह घोषणा बिहार विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने से सिर्फ 10 दिन पहले की गई थी (चुनाव की घोषणा 6 अक्टूबर को हुई थी)।

आरजेडी और कांग्रेस नेताओं का कहना है कि चुनाव के दौरान इस योजना का लागू रहना चुनाव आचार संहिता का खुला उल्लंघन है। विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह महिलाओं को लुभाने का “चुनावी तोहफ़ा” है, लेकिन चुनाव आयोग ने अब तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं की है।

तमिलनाडु में दो बार रोक चुका है चुनाव आयोग

पिछले दो दशकों में तमिलनाडु में चुनाव आयोग ने दो बार इसी तरह की योजनाओं पर सख्त रुख अपनाया था।

किसानों के लिए मनीऑर्डर योजना (2004):
जयललिता सरकार ने किसानों को नकद सहायता देने की योजना शुरू की थी, जिसके तहत हर किसान को साल में दो बार ₹500 से ₹625 दिए जाने थे। लेकिन 22 मार्च 2004 को तत्कालीन मुख्य निर्वाचन अधिकारी मृत्युंजय सारंगी ने आदेश दिया कि चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक कोई भुगतान न किया जाए।

डीएमके की फ्री कलर टीवी योजना (2006–2011):
करुणानिधि सरकार ने 2006 में मुफ़्त कलर टीवी वितरण योजना शुरू की थी। मार्च 2011 में जैसे ही चुनाव की तारीखों का ऐलान हुआ, चुनाव आयोग ने टीवी वितरण पर तत्काल रोक लगा दी। उस वक्त तक 1.62 करोड़ टीवी सेट बांटे जा चुके थे और करीब 9 लाख बाकी थे।

आयोग की निष्पक्षता पर उठे सवाल

बिहार में जारी योजना पर कोई रोक न लगाना आयोग की नीति पर सवाल खड़े कर रहा है। राजनीतिक दलों का कहना है कि अगर तमिलनाडु में कल्याण योजनाओं पर रोक लग सकती है, तो बिहार में भी वही मानक लागू होने चाहिए थे।

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