राघोपुर: लालू परिवार का गढ़, पर जनता के मन में सवाल — विकास या वफादारी?

राघोपुर: लालू परिवार का गढ़, पर जनता के मन में सवाल — विकास या वफादारी?

राघोपुर (पटना): विधानसभा चुनावों की सरगर्मी के बीच राघोपुर का माहौल दिलचस्प है। यह सीट न सिर्फ तेजस्वी यादव की राजनीति का केंद्र रही है, बल्कि लालू परिवार के दशकों पुराने प्रभाव की गवाही भी देती है। लेकिन जब जमीनी स्तर पर गांवों में जाकर लोगों से बात की जाती है, तो तस्वीर उतनी एकरंगी नहीं दिखती।

मल्लीपुर गांव में बातचीत की शुरुआत एक बुजुर्ग से हुई। उन्होंने कहा, “यहां तो सब तेजस्वी वाले हैं।” लेकिन जब उनसे पूछा गया कि कितना काम हुआ है, तो वे तुरंत दिक्कतें गिनाने लगे। बताया कि उनकी पत्नी को मुख्यमंत्री रोजगार सृजन योजना के तहत 10 हजार रुपये नहीं मिले हैं। उनकी पत्नी ने नाराजगी जताते हुए कहा, “मेरे समूह में कुछ को पैसा मिला, मुझे नहीं मिला। पैसा मिला होता तो वोट देती, अब नहीं दूंगी।”
वहीं, पास के ही घर में गया देवी को यह राशि मिली है और वे इससे खुश नजर आईं।

गांव के कई लोगों ने शिकायत की कि उन्हें राशन में पांच की बजाय चार किलो अनाज ही मिल रहा है। डीलर का कहना है कि “ट्रैक्टर से राशन लाने का खर्च भी तो निकालना होता है।”

इसी बीच, एक युवक धनंजय यादव पहुंचे — सलीकेदार कपड़े और हाथ में घड़ी ठीक करते हुए बोले, “मैं भी यादव हूं, लेकिन पढ़े-लिखे यादव जानते हैं कि विकास सिर्फ एनडीए कर सकती है। हम जात पर वोट नहीं देते।” उनका कहना था कि “राघोपुर को लालू परिवार ने ही जंगलराज का प्रतीक बना रखा है।”

दूसरी ओर, रुस्तमपुर गांव के बिंदेसर राय का गुस्सा सरकारों पर था। बोले, “न लालू की सरकार में कुछ मिला, न नीतीश की में। पेंशन के लिए डीलर को 400 रुपये भी दे दिए, फिर भी कुछ नहीं मिला। अब चाहे गंगा में डूब जाऊं, पर वोट लालू को ही दूंगा। बिहार की इज्जत लालू में ही है।”
उनके बगल में बैठे सुहाग भगत बोले, “मैं पासवान हूं, पर जात-पात नहीं मानता। जिसने खाने को दिया, उसी को वोट देंगे।”


तीसरी बार मैदान में तेजस्वी यादव

तेजस्वी यादव तीसरी बार राघोपुर से चुनावी मैदान में हैं। पिछली दो बार वे यहीं से विजयी रहे।
अब मुकाबला महागठबंधन और एनडीए के बीच ही नहीं, बल्कि प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी की वजह से त्रिकोणीय हो गया है। हालांकि खुद प्रशांत किशोर चुनाव नहीं लड़ रहे, लेकिन उन्होंने युवा कारोबारी चंचल सिंह (राजपूत समुदाय) को उम्मीदवार बनाया है, जो इलाके में सामाजिक कार्यों से जुड़े रहे हैं।

राघोपुर की जातीय राजनीति दिलचस्प है — यहां 32% यादव और 22% राजपूत मतदाता हैं। एनडीए ने भी इस बार यादव उम्मीदवार को मैदान में उतारा है, जबकि जनसुराज ने जातीय संतुलन साधने की कोशिश की है।


लालू परिवार का परंपरागत गढ़

राघोपुर को लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक गढ़ माना जाता है।
1995 और 2000 में लालू यादव ने यहीं से चुनाव जीता।
राबड़ी देवी ने भी 2000 के उपचुनाव और 2005 में यहां से जीत दर्ज की, लेकिन 2010 में वे जेडीयू के सतीश यादव से हार गईं।
2015 और 2020 में तेजस्वी यादव ने लगातार जीत हासिल की और दोनों बार सतीश यादव (बीजेपी) को हराया। इस बार फिर वही मुकाबला दोहराया जा रहा है।


विकास की तस्वीर उलट

पटना से राघोपुर तक अब छह-लेन वाला नया पुल बन गया है। पहले यहां तक पहुंचने के लिए पीपा पुल का सहारा लेना पड़ता था।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसी साल जून में इस पुल का उद्घाटन किया। हालांकि, पुल तक आते-आते विकास का चेहरा दिखता है, लेकिन गांवों में पहुंचते ही सच्चाई कुछ और नजर आती है — सड़कों के अलावा जीवन स्तर में सुधार अब भी दूर की बात है।

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