उत्तराखंड की पहाड़ियों से उठा सादगी का संदेश: अब शादियों में सिर्फ तीन गहने और शराब पर सख्त रोक,

उत्तराखंड की पहाड़ियों से उठा सादगी का संदेश: अब शादियों में सिर्फ तीन गहने और शराब पर सख्त रोक,

देहरादून | नवंबर 2025
जहां देश के बाकी हिस्सों में शादियां शानो-शौकत और खर्च की दौड़ में बदलती जा रही हैं, वहीं उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों से एक मिसाल भरी खबर आई है। गढ़वाल क्षेत्र के गांवों ने अब शादी की परंपराओं को सादगी और संस्कृति से जोड़ने का फैसला किया है। स्थानीय पंचायतों ने नए दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा है कि महिलाएं शादी के दौरान केवल तीन सोने के गहने पहनेंगी — नाक की पिन, मंगलसूत्र और झुमके, और समारोहों में शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा।

यह अनोखी पहल न सिर्फ दिखावे और प्रतिस्पर्धा की संस्कृति पर प्रहार है, बल्कि यह ग्रामीण समाज की उस सोच को भी दर्शाती है, जो परंपरा के साथ-साथ समानता और आर्थिक संतुलन को प्राथमिकता दे रही है।


🔹 पंचायत का ऐतिहासिक फैसला: सिर्फ तीन गहने और सादगी की शपथ

चकराता के कंधड़ और इंद्रोली गांवों की पंचायतों ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि शादी के मौके पर महिलाएं केवल तीन गहने पहनेंगी। अगर कोई परिवार इस नियम का उल्लंघन करता है, तो उस पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया जाएगा।

इस प्रस्ताव की शुरुआत खुद महिलाओं ने की। कंधड़ गांव की 45 वर्षीय लीको देवी बताती हैं,

“पहले शादी में गहनों की होड़ लग जाती थी। जो ज्यादा सोना पहनता, उसी की चर्चा होती। अब हमने तय किया है कि सिर्फ तीन गहने काफी हैं — ताकि किसी पर आर्थिक बोझ न पड़े।”


🔹 शराब पर सख्त रोक — “समारोह को संस्कृति बनाए, न कि तमाशा”

कंधड़ और इंद्रोली के बाद अब उत्तरकाशी के डुंडा ब्लॉक के लोदरा गांव ने भी अपनी ग्राम सभा में ऐतिहासिक प्रस्ताव पास किया है — शादियों और मुंडन जैसे पारिवारिक समारोहों में शराब पर प्रतिबंध।

गांव की प्रधान कविता बुटोला ने कहा,

“हमारे गांव का कोई भी व्यक्ति ऐसी शादी में शामिल नहीं होगा, जहां शराब परोसी जाती है। उल्लंघन करने वालों पर ₹51,000 का जुर्माना लगेगा और उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा।”

महिला मंगल दल और युवक मंगल दल के सहयोग से तैयार किए गए इस नियम का उद्देश्य है — समारोहों को सामाजिक सौहार्द और परंपरा का प्रतीक बनाना, न कि दिखावे का मंच।


🔹 “सोने और शराब ने शादियों की आत्मा को बदल दिया था”

कंधड़ गांव के बुज़ुर्ग अर्जुन सिंह ने कहा,

“पहले आभूषण खुशी का प्रतीक थे, अब चिंता का कारण बन गए हैं। माता-पिता अपनी बेटियों की शादी से पहले कर्ज में डूब जाते हैं।”

वहीं 56 वर्षीय टीकम सिंह ने कहा,

“अब शादी में रस्मों की नहीं, डीजे और विदेशी शराब की चर्चा होती है। नए नियम हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का मौका देंगे।”


🔹 सादगी से चमकता नया उत्तराखंड

उत्तराखंड के इन गांवों का यह कदम न सिर्फ सामाजिक समानता की दिशा में एक बड़ा बदलाव है, बल्कि यह पूरे राज्य के लिए एक नई सोच की मिसाल बन सकता है। जहां बाकी जगहें दिखावे की होड़ में फंस चुकी हैं, वहीं ये गांव अपनी परंपराओं को सादगी और आत्मसम्मान के साथ संवारने में जुटे हैं।

शादी अब सिर्फ एक आयोजन नहीं — बल्कि समाज में बदलाव की शुरुआत बन रही है।

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