नई दिल्ली, 10 अगस्त 2025 — इस स्वतंत्रता दिवस पर दिल्ली ने सिनेमा के ज़रिए आज़ादी का उत्सव एक नए अंदाज़ में मनाया। 8 से 10 अगस्त तक एनसीयूआई ऑडिटोरियम, सीरी फोर्ट रोड में आयोजित ‘सेलिब्रेटिंग इंडिया फिल्म फेस्टिवल (CIFF 2025)’ ने राजधानी को भारतीय सिनेमा, संस्कृति और इतिहास के अद्वितीय संगम का साक्षी बना दिया।
तीन दिन चले इस भव्य महोत्सव में क्लासिक और समकालीन फिल्मों से लेकर लघु फिल्में, डॉक्यूमेंट्रीज़, पैनल चर्चाएँ और संगीत प्रस्तुतियाँ शामिल थीं, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि सिनेमा अब केवल पर्दे तक सीमित नहीं, बल्कि भारत की धड़कन और आत्मा का जीवंत प्रतिबिंब है।
पहला दिन: सिनेमा में संवेदना और इतिहास का मिलन
फेस्टिवल की शुरुआत मधुर भंडारकर की ‘इंडिया लॉकडाउन’ से हुई, जिसने महामारी के दौर के मानवीय पहलुओं को मार्मिकता से पेश किया। इसके बाद मनोज कुमार की महाकाव्य फिल्म ‘क्रांति’ ने दर्शकों को स्वतंत्रता संग्राम के दौर में लौटा दिया।
वहीं, बीटा हॉल में दिखाई गई लघु फिल्में ‘बही’ और ‘पंख’ ने व्यक्तिगत रिश्तों और अनुभवों की कोमल परतों को उभारा। शाम को निर्देशक आर.एस. प्रसन्ना ने सांस्कृतिक समावेशन पर प्रेरक चर्चा की।
दूसरा दिन: क्लासिक का जादू और नए सिनेमा की चमक
‘उमराव जान’ को 4K में पुनर्स्थापित रूप में देखकर दर्शक मंत्रमुग्ध रह गए, जबकि ‘वेंकी’ और ‘सुंदरपुर कैओस’ जैसी फिल्में क्षेत्रीय सिनेमा के साहसिक प्रयोगों का प्रतीक बनीं।
लघु फिल्मों में ‘बेहरुपिया’ से ‘विरुंधु’ तक की प्रस्तुतियों ने सामाजिक और भावनात्मक मुद्दों को छुआ। डॉक्यूमेंट्रीज़ जैसे ‘पवाझा’, ‘कोरल्स’, ‘कुलिनरी हेरिटेज ऑफ इंडिया’ ने भारत की विविधता को उत्सव में बदला।
हेमा सरदेसाई की प्रस्तुति ‘फ्रॉम भावना टू बीट’ ने संगीत और आत्मा के रिश्ते पर गहरा प्रभाव डाला, जबकि ‘ए बॉय हू ड्रीम्ट ऑफ इलेक्ट्रिसिटी’ ने संघर्ष और प्रेरणा की कहानी बयां की।
अंतिम दिन: संस्कृति, विचार और आत्म-अभिव्यक्ति का उत्सव
अंतिम दिन की शुरुआत ‘कॉल मी डांसर’ से हुई, जिसके बाद ‘मुखाम पोस्ट देवणाचा घर’ जैसी मराठी फिल्म ने लोक-संस्कृति की गूंज पहुंचाई।
एफटीआईआई की प्रस्तुतियों में कैफ़ी आज़मी पर बनी डॉक्यूमेंट्री, पायल कपाड़िया की ‘एंड व्हाट इज़ द समर सेइंग’ और चिदानंद नाइक की ‘सनफ्लॉवर्स वेयर द फर्स्ट वन्स टू नो’ ने दर्शकों को सोचने पर मजबूर किया।
दोपहर में एफटीआईआई मास्टरक्लास और वरिष्ठ फिल्म समीक्षकों ने भारतीय सिनेमा की बदलती भाषा पर चर्चा की। भारतबाला के ‘वर्चुअल भारत’ प्रोजेक्ट ने संस्कृति संरक्षण का डिजिटल दृष्टिकोण सामने रखा।
नेताओं और कलाकारों की मौजूदगी ने बढ़ाई शोभा
समापन समारोह में दिल्ली सरकार के कला व संस्कृति मंत्री कपिल मिश्रा ने सीआईएफएफ को भारत की सांस्कृतिक विरासत का “जीवंत श्रद्धांजलि” बताया। वहीं मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने नई राज्य फिल्म नीति की घोषणा की, जिससे दिल्ली में फिल्म टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा।
हेमा सरदेसाई ने अपनी सुरीली आवाज़ में ‘बादल पे पाँव हैं’ सहित कई गीत गाकर समां बांधा, वहीं रिकी केज की ‘गांधी: मंत्र ऑफ कम्पैशन’ प्रस्तुति ने भारतीय शास्त्रीय वाद्ययंत्रों और आधुनिक ऑर्केस्ट्रा का अद्भुत संगम रचा।
कार्यक्रम में मनोज तिवारी, राजीव शुक्ला, डॉ. अन्नू कपूर, भारतबाला, गीतांजलि मिश्रा सहित कई प्रमुख हस्तियां शामिल रहीं।
“दिल्ली को मिला अपना विश्वस्तरीय फिल्म फेस्टिवल”
CIFF के सीएमडी मुकेश गुप्ता ने कहा, “CIFF 2025 ने दिल्ली को उसका अपना अंतरराष्ट्रीय स्तर का फिल्म फेस्टिवल दिया है। यह महज आयोजन नहीं, एक सांस्कृतिक क्रांति है, जिसने दिल्ली को भारतीय सिनेमा के दिल में तब्दील कर दिया।”
निष्कर्ष: एक रील जो दिल में बस गई
तीन दिनों तक दिल्ली केवल फिल्में नहीं देख रही थी, बल्कि उन्हें जी रही थी। हर स्क्रीन एक नई दुनिया थी, हर कहानी एक नई सोच, और हर संवाद एक नई दिशा।
CIFF 2025 ने साबित किया कि आज का भारत अपनी कहानियों को गर्व से दुनिया के सामने रखने को तैयार है—रचनात्मकता, परंपरा और नवाचार के संगम के साथ।
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