ब्रह्मोस: अधूरे सुखद की कहानी से विश्वस्तरीय सुपरसोनिक हमला-सिस्टम तक — नया संस्करण, बढ़ी मारकता और पाकिस्तान पर सीधे निशाना

ब्रह्मोस: अधूरे सुखद की कहानी से विश्वस्तरीय सुपरसोनिक हमला-सिस्टम तक — नया संस्करण, बढ़ी मारकता और पाकिस्तान पर सीधे निशाना

नई दिल्ली, 22 अक्टूबर 2025 — 1990 के दशक की एक मार्गदर्शक वार्ता से जन्मे ब्रह्मोस ने आज भारत को क्षेत्रीय रणनीति में एक नया हठी साहस दिया है। 1993 में DRDO के तत्कालीन सचिव डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के रूस के दौरे के दौरान पाए गए एक अधूरे सुपरसोनिक इंजन प्रोजेक्ट को पुनर्जीवित कर, भारत-रूस साझेदारी ने दुनिया की सबसे तेज़ क्रूज़ मिसाइलों में से एक — ब्रह्मोस — का निर्माण किया। आज यह मिसाइल तीनों सेवाओं में तैनात होकर नई पीढ़ी के युद्धक्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभा रही है।

डॉ. कलाम और रूस के उप रक्षा मंत्री एन.वी. मिखाइलोव के द्विपक्षीय समझौते (12 फरवरी 1998) के तहत डीआरडीओ और रूसी एनपीओएम ने ब्रह्मोस एयरोस्पेस की स्थापना की — भारत की 50.5% और रूस की 49.5% हिस्सेदारी के साथ। पहला सफल परीक्षण 12 जून 2001 को ओडिशा के चांदीपुर से हुआ। तब से यह मिसाइल सेना, नौसेना और वायु सेना में अपनी जगह बना चुकी है।

ब्रहमोस अपनी रैमजेट टेक्नॉलॉजी की बदौलत लगभग मैक 2.8 (करीब 3,400 किमी/घंटा) की उच्च गति से उड़ती है और केवल 10 मीटर की उड़ान ऊँचाई तक जमीन के बेहद नज़दीक लक्ष्य पर वार करने में सक्षम है। मूल MTCR नियमों के अनुरूप 290 किमी की सीमा को 2016 में भारत के MTCR सदस्य बनने के बाद 450 किमी तक बढ़ाया गया था; अब इसका अगला लक्ष्य 800 किमी के संस्करण का विकास है, जिसमें उन्नत रैमजेट इंजन और बेहतर मार्गदर्शन सिस्टम शामिल होंगे।

ब्रहमोस के सुखोई-30MKI में समाकलन को DRDO के पूर्व महानिदेशक एसके मिश्रा ने सबसे चुनौतीपूर्ण बताया। इस एकीकरण के लिए HAL ने अप्रत्याशित तौर पर कम लागत (₹88 करोड़ बनाम सुखोई का अनुमानित ₹1,300 करोड़) में काम पूरा कर भारतीय इंजीनियरिंग की मजबूती दिखाई। हवाई परिचालन क्षमता 2013 में जुड़ने के बाद ब्रह्मोस सभी प्रमुख प्लेटफार्मों के लिए उपयुक्त बन गया।

निर्यात के लिहाज़ से ब्रह्मोस की सफलता भी उल्लेखनीय रही — 2024 में फिलीपींस को यह सुपरसोनिक सिस्टम भारत का पहला निर्यात रहा। बाद में 2022 में हुए $375 मिलियन के सौदे की दूसरी खेप अप्रैल 2025 में वितरित की गई। अर्जेंटीना सहित कई देशों ने गहरी रुचि दिखाई है, जिन्होंने इसकी वैश्विक विश्वसनीयता बढ़ाई है।

सैन्य खुफिया एवं ऑपरेशन के क्षेत्र में ब्रह्मोस की क्षमताओं का उपयोग भारत ने हालिया अभियानों में भी किया है। कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार 7 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर के दौरान लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों पर निशाना साधने में ब्रह्मोस का अहम योगदान बताया गया है — यह संकेत करता है कि ब्रह्मोस न सिर्फ सीमापार शक्ति प्रक्षेपण का साधन बल्कि आतंकवादी नेटवर्कों के खिलाफ लक्षित कार्यवाही में भी प्रभावी साबित हो रही है।

रक्षा मंत्रालय और सेना-नौसेना के बीच हालिया सौदों ने ब्रह्मोस के बड़े पैमाने पर अधिग्रहण की राह खोल दी है — मार्च में नौसेना के लिए 220 से अधिक ब्रह्मोस मिसाइलों के ₹19,519 करोड़ वाले अनुबंध पर हस्ताक्षर किए गए थे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे प्रदर्शन-क्षमता बढ़ाने वाला और विरोधियों को संदेश देने वाला कदम बताया, और कहा कि “अब ब्रह्मोस की पहुँच में पाकिस्तान की एक-एक इंच जमीन है।”

आगे का परिदृश्य: ब्रह्मोस का 800 किमी संस्करण, बेहतर जामिंग-रोधी तंत्र और अधिक सटीक मार्गदर्शन आने पर क्षेत्रीय रणनीति, नौसैनिक निपटान और संयोगिक रक्षा-नीति पर गहरा असर पड़ेगा। भारत की मिसाइल प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता की दिशा में यह प्रोजेक्ट एक मील का पत्थर बना रहा है — वही अधूरा सुखद जिसने 1990 के दशक में जन्म लिया था, आज वैश्विक बाजारों और रणक्षेत्रों में अपना प्रभाव जमा रहा है।

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