करवा चौथ स्पेशल: प्यार, आस्था और विश्वास से जुड़ी वो कहानी, जिसने जन्म दिया सुहागिनों के सबसे पवित्र व्रत को

करवा चौथ स्पेशल: प्यार, आस्था और विश्वास से जुड़ी वो कहानी, जिसने जन्म दिया सुहागिनों के सबसे पवित्र व्रत को

नई दिल्ली:
देशभर में आज करवा चौथ का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। महिलाएं सुबह से ही निर्जला व्रत रखकर अपने पतियों की लंबी आयु की कामना कर रही हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस त्योहार की शुरुआत एक ऐसी कथा से हुई थी, जिसने प्रेम, समर्पण और विश्वास को एक नया अर्थ दिया?

? सात बहनों की कथा से जुड़ी करवा चौथ की शुरुआत

पुराणों और लोककथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में एक राजा की सात बेटियाँ थीं। सभी बहनों ने करवा चौथ के दिन अपने पतियों की दीर्घायु के लिए व्रत रखा। सबसे छोटी बहन दिनभर भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी। उसके भाइयों को उसकी तकलीफ नहीं देखी गई, तो उन्होंने एक शरारत की—
उन्होंने पीपल के पेड़ के पीछे दीपक जलाया और छलनी से दिखाया, ताकि लगे कि चाँद निकल आया है। छोटी बहन ने भाइयों की बात मान ली और बिना असली चाँद देखे व्रत तोड़ दिया।

किंवदंती के अनुसार, उसी रात उसका पति अचानक बेहोश हो गया और उसकी हालत गंभीर हो गई। तभी रास्ते में उसे देवी पार्वती मिलीं। देवी ने कहा,

“तुमसे भूल हो गई है, तुमने अधूरा व्रत तोड़ा है। अब पूरे विधि-विधान से सच्चे मन से व्रत रखो, सब ठीक होगा।”

अगले वर्ष उस स्त्री ने पूरी निष्ठा से करवा चौथ का व्रत किया, जिसके बाद उसका पति स्वस्थ हो गया। तभी से यह व्रत हर साल किया जाने लगा।


सुहागिनों का पर्व, विश्वास का प्रतीक

आज भी देशभर में महिलाएं सुबह सरगी खाकर व्रत की शुरुआत करती हैं और शाम को सोलह श्रृंगार कर चाँद के दर्शन के बाद व्रत तोड़ती हैं।
यह पर्व न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि पति-पत्नी के अटूट बंधन, समर्पण और प्रेम की गहराई का उत्सव भी है।

करवा चौथ के दिन बाज़ारों में रौनक देखते ही बनती है — मेंहदी, चूड़ियाँ, सजावटी थाल और करवे की खरीदारी चरम पर होती है।


करवा चौथ के महत्व पर पंडितों की राय

ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि करवा चौथ के दिन चतुर्थी तिथि और चंद्र दर्शन का योग अत्यंत शुभ माना जाता है। यह व्रत केवल धार्मिक नहीं, बल्कि पारिवारिक एकता और प्रेम का प्रतीक है।

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