25 साल जंगल में, AK-47 से खेत की हँसिया तक : पहली महिला माओवादी मिलिट्री कमांडर शम्बाला देवी की कहानी

25 साल जंगल में, AK-47 से खेत की हँसिया तक : पहली महिला माओवादी मिलिट्री कमांडर शम्बाला देवी की कहानी

गाढ़े हरे रंग की शर्ट, पैंट, कंधे पर AK-47, कमर पर वॉकी-टॉकी और कलाई पर घड़ी। यह तस्वीर आज भी शम्बाला देवी के पास है। लगभग 25 साल पहले ली गई यह तस्वीर उस दौर की है, जब वे भारत के माओवादी आंदोलन की पहली महिला ‘मिलिट्री कमांडर’ बनी थीं।

लेकिन अब वही देवी खेत में हँसिया लेकर काम करती दिखती हैं। 2014 में उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया और विद्रोह की ज़िंदगी छोड़ दी।


देवी से मुलाक़ात : विद्रोह से गाँव तक

पचास वर्षीय शम्बाला देवी से हमारे संवाद की शुरुआत उनके गाँव से होती है। उन्होंने हमें चाय पिलाई और फिर खेत की ओर चलते-चलते अपने अनुभव बाँटे। फ़िरोज़ी साड़ी में सजी देवी अब साधारण ग्रामीण महिला की तरह दिखती हैं। लेकिन उनके अतीत में रक्त, बारूद और संघर्ष की गहरी छाप है।

देवी बताती हैं—
“हम भूमिहीन थे, भूख से जूझते थे। जंगल की ज़मीन जोतने पर हमें पीटा जाता। पुलिस हमारी बात नहीं सुनती थी। उस वक़्त लगा कि अपनी बात कहने का एक ही तरीक़ा है—बंदूक़ की नोक पर।”

13 साल की उम्र में पिता को अधिकारियों के हाथों पिटते और जेल जाते देखना उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बना। उसी वक़्त उन्होंने घर छोड़ विद्रोह का रास्ता चुना।


माओवादी आंदोलन और देवी की भूमिका

1988 में देवी माओवादी दस्ते से जुड़ीं। उस वक़्त आंदोलन में महिलाओं की संख्या बेहद कम थी। लेकिन उन्होंने जल्द ही 30 लड़ाकों की प्लाटून की कमान संभाल ली।

देवी याद करती हैं—
“पहली बार घात लगाकर हमला किया था। 45 किलो की लैंडमाइन बिछाई और माइन-प्रूफ़ गाड़ी उड़ा दी। उसमें सुरक्षा बल मारे गए।”

उनके शब्दों में इन हमलों के लिए न पछतावा है, न ही माफ़ी।

साल 2000 के दशक तक माओवादी विद्रोह अपने चरम पर था—10 राज्यों तक फैला, हज़ारों लोग शामिल, और केंद्र सरकार की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौतियों में से एक बना।


सरकार का दावा और बदलती तस्वीर

भारत का माओवादी विद्रोह 1967 के नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन से निकला। दशकों तक यह मध्य और पूर्वी भारत के आदिवासी इलाक़ों में जड़ें जमाए रहा। विद्रोही दावा करते हैं कि वे ज़मीन और संसाधनों पर न्यायपूर्ण बँटवारे के लिए लड़ रहे हैं, जबकि सरकार का कहना है कि यह “विकास में बाधा” है।

गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में कहा था—
“नक्सलवाद गरीब आदिवासी क्षेत्रों के लिए सबसे बड़ी आपदा है। 2026 तक भारत नक्सल-मुक्त होगा।”


देवी का दूसरा जन्म : बंदूक़ से हल तक

25 साल जंगल में बिताने के बाद 2014 में शम्बाला देवी ने हथियार डाल दिए। अब वे खेतों में काम करती हैं, गाँव में रहती हैं और विद्रोह से दूरी बनाए हुए हैं।

वे कहती हैं—
“जिंदगी का एक दौर था जब बंदूक ही रास्ता लगी। लेकिन अब मैं अपने गाँव के साथ जीना चाहती हूँ।”

देवी के पति रविंदर भी माओवादी कमांडर रहे हैं। लेकिन जहाँ उनके अनुभव तस्वीरों और वीडियो में कैद हैं, वहीं देवी की कहानी अब तक परछाइयों में दबी रही।


निष्कर्ष

शम्बाला देवी की दास्तान उस भारत की कहानी है, जहाँ गरीबी, भूख और हाशिए पर छूटे लोगों का दर्द उन्हें बंदूक़ तक ले गया। लेकिन वही ज़िंदगी बाद में खेतों की हरी-भरी ज़मीन में लौट आई।

उनकी पुरानी तस्वीर में दिखती AK-47 अब सिर्फ़ एक बीती हुई कहानी है। आज उनके हाथों में हँसिया है—जिससे वे अपने खेत और गाँव का भविष्य सँवारना चाहती हैं।

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