उत्तर प्रदेश के छोटे से कस्बे रामपुर के बाहरी हिस्से में, धूल से ढकी एक पुरानी हवेली थी — टूटी दीवारें, झरते प्लास्टर, और खिड़कियों से झांकती लताओं ने उसे जैसे ज़िंदा कब्र बना दिया था।
गांव वाले उसे “भूतिया हवेली” कहते थे, और वहाँ से गुजरते हुए अपनी चाल तेज़ कर लेते थे।
पर उस हवेली में रहती थीं जानकी देवी, जिन्हें सब “जानकी माँ” कहकर पुकारते थे।
सफ़ेद बाल, काँपते हाथ, और मोटे चश्मे के पीछे झिलमिलाती थकी आँखें… ज़िंदगी जैसे अब उनके लिए बस एक इंतज़ार बन चुकी थी।
लोग तरह-तरह की बातें करते —
कोई कहता उनके पति उन्हें छोड़ गए थे,
कोई कहता उनकी कोई संतान नहीं थी,
और कुछ तो ये भी कहते कि हवेली के नीचे कोई पुराना खज़ाना छिपा है।
लेकिन इन अफ़वाहों से दूर, हर सुबह उसी हवेली के दरवाज़े पर एक आवाज़ गूंजती —
“माँ जी… दूध ले आइए…”
वो था रामू, गांव का दूधवाला।
तीस-पैंतीस बरस का सीधा-सादा आदमी, जिसने अपने पिता की मौत के बाद ये काम संभाला था।
अब गांव में पैकेट वाला दूध आ गया था, लोग “ब्रांड” पर भरोसा करते थे, “रामू” पर नहीं।
फिर भी, रामू रोज़ अपनी साइकिल पर टंगे दो कनस्तरों के साथ गलियों में निकलता था —
“किसी के घर में बच्चा हो या बुज़ुर्ग… दूध तो पहुंचना चाहिए,” यही उसका विश्वास था।
एक सुबह जब वो हवेली पहुंचा, तो दरवाज़ा आधा खुला मिला।
अंदर जाकर देखा — जानकी माँ बिस्तर पर लेटी थीं, बहुत कमज़ोर।
“माँ जी, तबीयत ठीक है?” उसने पूछा।
कमज़ोर मुस्कान के साथ उन्होंने कहा —
“रामू बेटा… दवा खत्म हो गई है, और पैसे भी नहीं बचे। दूध अब मत लाना।”
रामू का गला भर आया।
“माँ जी, ऐसा मत कहिए। जब तक आप ठीक नहीं हो जातीं, दूध मैं मुफ़्त में दूँगा।”
जानकी माँ ने कुछ कहना चाहा, मगर आवाज़ हलक में अटक गई।
उन्होंने बस इतना कहा —
“बेटा… भगवान तुम्हारा भला करे।”
अगले तीस दिन, रामू बिना चूके हर सुबह दूध रख जाता।
कभी दवा भी ले आता, कभी सूप बना देता।
गांव वालों ने ताना भी मारा —
“अरे रामू, बूढ़ी औरत क्या तेरी माँ लगती है?”
रामू बस मुस्कुरा देता —
“कभी-कभी खून से नहीं, इंसानियत से रिश्ता बनता है।”
फिर एक सुबह हवेली के दरवाज़े पर दस्तक दी — कोई जवाब नहीं आया।
रामू ने झाँका, तो देखा जानकी माँ शांति से लेटी थीं, चेहरा बेहद सुकून भरा।
पास में एक चिट्ठी और एक सीलबंद लिफाफा रखा था।
चिट्ठी पर लिखा था —
“रामू बेटे,
जब सबने मेरा साथ छोड़ा, तू रोज़ मेरे लिए आया।
तूने बिना कुछ चाहे मेरे जीवन के आख़िरी दिनों में ममता दी।
मेरी कोई औलाद नहीं थी… इसलिए अब तू ही मेरा बेटा है।
इस हवेली और ज़मीन की वसीयत तेरे नाम की जाती है।
इंसानियत का मोल सोने-चाँदी से नहीं चुकाया जा सकता —
मगर मेरा आशीर्वाद तेरे साथ हमेशा रहेगा।
— तेरी जानकी माँ।”
जब ये बात गांव में फैली, तो सब हैरान रह गए।
वो “भूतिया हवेली” अब “ममता निवास” कहलाने लगी —
जहाँ रामू ने एक छोटा सा “निःशुल्क दूध वितरण केंद्र” खोल दिया,
जिससे कोई भी बुज़ुर्ग भूखा या अकेला न रहे।
और लोग कहते हैं,
जब सुबह की पहली किरण उस हवेली की दीवार पर पड़ती है,
तो वहां से एक ममता भरी मुस्कान जैसे अब भी कहती है —
“रामू बेटा… दूध रख दिया?”
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