तिहरा हत्याकांड, डायन-बिसाही के शक में परिवार के तीन सदस्यों की बेरहमी से हत्या,

तिहरा हत्याकांड, डायन-बिसाही के शक में परिवार के तीन सदस्यों की बेरहमी से हत्या,

झारखंड के लोहरदगा जिले से एक बार फिर अंधविश्वास के नाम पर हुई भयावह वारदात ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। पेशरार थाना क्षेत्र के केकरांग बरटोली गांव में बुधवार आधी रात को एक ही परिवार के तीन लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई। मारे गए लोगों में एक दंपती और उनका मासूम बेटा शामिल है।

मृतकों की पहचान लक्ष्मण नगेसिया (47), बिफनी नगेसिया (45) और उनके 9 वर्षीय बेटे रामविलास नगेसिया के रूप में हुई है। हमलावरों ने सभी को कुल्हाड़ी और कुदाल जैसे धारदार हथियारों से काट डाला। हत्या के बाद शवों को घर के एक कमरे में बंद कर दिया गया, ताकि देर से किसी को पता चले।

डायन-बिसाही बना खून की वजह?

इस वीभत्स घटना के पीछे जो वजह सामने आई है, वह और भी चिंताजनक है। मृतकों की बहू सुखमनिया नगेसिया ने पुलिस को बताया कि गांव के ही कुछ लोग उसके सास-ससुर को डायन (जादू-टोना करने वाली) मानते थे और पिछले कुछ समय से उन्हें प्रताड़ित कर रहे थे। यहां तक कि इस मसले को लेकर गांव में पंचायत भी बुलाई जा चुकी थी।

सुखमनिया के अनुसार, “रात को जब पूरा परिवार सो रहा था, तब कुछ लोगों ने घर में घुसकर पहले तीनों की हत्या की और फिर मुझे एक कमरे में बंद कर दिया।”

पुलिस सतर्क, अपराधी फरार

घटना की सूचना मिलते ही एसडीपीओ वेदांत शंकर सहित पुलिस टीम मौके पर पहुंची और जांच शुरू कर दी गई है। पुलिस का कहना है कि प्रारंभिक जांच में यह मामला अंधविश्वास और डायन-बिसाही के आरोप से जुड़ा हुआ लग रहा है।

एसडीपीओ वेदांत शंकर ने कहा,

“तीन लोगों की निर्मम हत्या हुई है। पुलिस अपराधियों की पहचान में जुटी है। छापेमारी जारी है और जल्द ही आरोपियों को पकड़ लिया जाएगा।”

अंधविश्वास की भेंट चढ़ते लोग

झारखंड के कई इलाकों में डायन-बिसाही के अंधविश्वास के चलते महिलाओं और बुजुर्गों को निशाना बनाया जाता रहा है। साल दर साल इस कुप्रथा के खिलाफ अभियान चलाए जाने के बावजूद ये घटनाएं रुक नहीं रही हैं।

लोहरदगा की इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है — कब रुकेगा अंधविश्वास का ये खूनी खेल?

प्रशासन और समाज दोनों की जिम्मेदारी

इस हत्याकांड ने न सिर्फ पुलिस प्रशासन की सतर्कता पर सवाल उठाया है, बल्कि समाज में फैले अंधविश्वास और कुरीतियों को जड़ से उखाड़ फेंकने की जरूरत को फिर उजागर किया है। जब तक गांव-देहात में शिक्षा, जागरूकता और कानूनी सख्ती नहीं पहुंचती, तब तक इस तरह के मासूम लोग अंधविश्वास की बलि चढ़ते रहेंगे।

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