रूस की हाइपरसोनिक मिसाइलों से क्यों घबराया यूरोप, हथियारों की इस होड़ में कहां खड़े हैं बाकी देश?

रूस की हाइपरसोनिक मिसाइलों से क्यों घबराया यूरोप, हथियारों की इस होड़ में कहां खड़े हैं बाकी देश?

रूस ने पिछले कुछ वर्षों में हाइपरसोनिक हथियारों के क्षेत्र में उल्लेखनीय बढ़त हासिल की है। किंझाल (Kinzhal), अवांगार्ड (Avangard) और जिरकॉन (Zircon) जैसी मिसाइलों ने न केवल अमेरिका बल्कि पूरे यूरोप की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। इन हथियारों की सबसे बड़ी ताक़त है—ध्वनि से 5 से 27 गुना तक अधिक रफ़्तार और उड़ान के दौरान दिशा बदलने की क्षमता। यही वजह है कि मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम इन्हें रोक पाने में लगभग असमर्थ हैं।

यूरोप क्यों है चिंतित?

1. सीधा ख़तरा: रूस की हाइपरसोनिक मिसाइलें मिनटों में यूरोपीय शहरों को निशाना बना सकती हैं।

2. नाटो की चुनौती: NATO के पास अभी तक ऐसा कोई भरोसेमंद सिस्टम नहीं है जो इन मिसाइलों को रोक सके।

3. रणनीतिक दबाव: रूस की बढ़ती क्षमता यूरोप की सुरक्षा नीतियों और सैन्य रणनीतियों को लगातार बदलने पर मजबूर कर रही है।

इस होड़ में कहां खड़े हैं बाकी देश?

अमेरिका: हाइपरसोनिक हथियारों के विकास पर अरबों डॉलर खर्च कर रहा है। ARRW (Air-launched Rapid Response Weapon) और HAWC (Hypersonic Air-breathing Weapon Concept) पर काम जारी है, लेकिन रूस और चीन से पीछे है।

चीन: DF-17 जैसे हथियारों के साथ पहले ही बाज़ार में बढ़त ले चुका है। उसकी मिसाइलें न सिर्फ परीक्षण में सफल रही हैं बल्कि बड़े पैमाने पर सैन्य तैनाती की स्थिति में भी हैं।

भारत: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने रूस के साथ मिलकर ब्रह्मोस-II हाइपरसोनिक मिसाइल पर काम शुरू किया है। इसके अलावा हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर व्हीकल (HSTDV) सफलतापूर्वक परीक्षण किया जा चुका है

।यूरोप (फ्रांस, जर्मनी): अनुसंधान के शुरुआती चरण में हैं। फ्रांस ASN4G प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, लेकिन तैनाती में समय लगेगा।

जापान और ऑस्ट्रेलिया: अमेरिका के साथ साझेदारी में तकनीक विकसित कर रहे हैं।

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