रांची: झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के आरोपों ने राज्य की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा भूचाल ला दिया है। लंबे समय से छात्रों और अभ्यर्थियों द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन के बाद राज्य सरकार ने JSSC-CGL सहित TDPL द्वारा आयोजित कई भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला लिया है। सरकार के इस निर्णय के बाद हजारों अभ्यर्थियों के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं, वहीं दूसरी ओर जांच एजेंसियों की कार्रवाई लगातार तेज होती जा रही है।
इस पूरे मामले में अभय तिवारी को कथित मास्टरमाइंड माना जा रहा है। जांच एजेंसियों के अनुसार भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी, प्रश्नपत्र लीक, फर्जीवाड़ा और प्रभावशाली नेटवर्क के जरिए उम्मीदवारों को अनुचित लाभ पहुंचाने की आशंका है। मामले की जांच कर रही CID और SIT ने अभय तिवारी को गिरफ्तार करने के बाद उसके परिवार और सहयोगियों पर भी शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। हाल ही में उसकी पत्नी और भाई को भी गिरफ्तार कर पूछताछ की गई है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि भर्ती प्रक्रिया में किस-किस स्तर पर अनियमितताएं हुईं और इससे किन लोगों को लाभ मिला।
CID और SIT की संयुक्त टीम लगातार विभिन्न स्थानों पर छापेमारी कर रही है। जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण दस्तावेज, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और डिजिटल रिकॉर्ड जब्त किए गए हैं। अधिकारियों का मानना है कि इन साक्ष्यों से भर्ती प्रक्रिया में हुई कथित गड़बड़ियों की परतें खुल सकती हैं। जांच एजेंसियों ने झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) के कार्यालय में भी पहुंचकर कई दस्तावेजों की जांच की तथा संबंधित अधिकारियों से पूछताछ की है।
भर्ती परीक्षाओं को रद्द किए जाने के बाद छात्रों और अभ्यर्थियों की प्रतिक्रिया भी सामने आ रही है। कई छात्र संगठनों ने सरकार के फैसले का स्वागत किया है और इसे आंदोलन की जीत बताया है। उनका कहना है कि यदि परीक्षा प्रक्रिया में अनियमितताएं हुई हैं तो निष्पक्ष भर्ती सुनिश्चित करने के लिए परीक्षा रद्द करना आवश्यक था। दूसरी ओर, ऐसे अभ्यर्थी जिन्होंने परीक्षा पास कर नियुक्ति प्राप्त की थी, वे इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि कुछ लोगों की गलती की सजा सभी सफल उम्मीदवारों को नहीं दी जानी चाहिए। कई अभ्यर्थी न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं।
मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। विपक्षी दल सरकार पर भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने में विफल रहने का आरोप लगा रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि यदि समय रहते शिकायतों पर कार्रवाई की गई होती तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। वहीं सरकार का दावा है कि उसने छात्रों की मांगों को गंभीरता से लिया और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। सरकार का कहना है कि दोषी चाहे कोई भी हो, उसे बख्शा नहीं जाएगा।
इस घोटाले को लेकर सबसे अधिक चर्चा इस बात की हो रही है कि क्या जांच की आंच बड़े अधिकारियों या राजनीतिक नेताओं तक पहुंचेगी। फिलहाल जांच एजेंसियों ने किसी वरिष्ठ राजनीतिक नेता की संलिप्तता की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। हालांकि लगातार हो रही गिरफ्तारियों और छापेमारी के कारण यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। राजनीतिक गलियारों में विभिन्न तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं, लेकिन जांच एजेंसियों का कहना है कि वे केवल उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ रही हैं और किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी तथ्यों की जांच की जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि झारखंड का यह मामला देश के प्रमुख भर्ती परीक्षा विवादों में शामिल हो सकता है। यदि जांच में व्यापक स्तर पर गड़बड़ियां साबित होती हैं, तो इससे भर्ती प्रक्रिया में सुधार और पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में बड़े कदम उठाए जा सकते हैं। फिलहाल राज्य की नजर CID और SIT की जांच पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में जांच से जुड़े नए खुलासे इस पूरे मामले की दिशा और दशा तय कर सकते हैं। राज्य के लाखों युवा उम्मीद कर रहे हैं कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो और भविष्य में भर्ती प्रक्रियाएं पूरी तरह निष्पक्ष एवं पारदर्शी बनें।
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