एशिया कप: भारत–पाकिस्तान मैच के बाद ‘हैंडशेक विवाद’, क्रिकेट और राजनीति के बीच फिर टकराव

एशिया कप: भारत–पाकिस्तान मैच के बाद ‘हैंडशेक विवाद’, क्रिकेट और राजनीति के बीच फिर टकराव

नई दिल्ली/दुबई — एशिया कप के सुपर-4 चरण में रविवार को भारत और पाकिस्तान की टीमें एक बार फिर आमने–सामने होंगी, लेकिन उससे पहले 14 सितंबर को दुबई में खेले गए मुकाबले के बाद उठे विवाद ने क्रिकेट और राजनीति के रिश्तों पर नई बहस छेड़ दी है।

उस मैच में भारत ने पाकिस्तान को 7 विकेट से हराकर शानदार जीत दर्ज की थी। भारतीय क्रिकेट प्रेमियों ने इस जीत का जश्न भी मनाया, लेकिन मैच खत्म होने के बाद खिलाड़ियों के बीच परंपरागत ‘हैंडशेक’ न होने पर बवाल खड़ा हो गया।

भारतीय खिलाड़ियों ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ नहीं मिलाया। भारतीय पक्ष का कहना था कि यह क़दम “आतंकवाद के पीड़ितों के साथ एकजुटता” दिखाने के लिए उठाया गया। लेकिन पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) ने इस पर तीखी आपत्ति जताई और आरोप लगाया कि मैच रेफ़री एंडी पाइक्रॉफ़्ट ने टॉस के दौरान दोनों कप्तानों—भारत के सूर्यकुमार यादव और पाकिस्तान के सलमान आगा—को हाथ न मिलाने की सलाह दी थी। इस शिकायत को पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) तक भी पहुँचाया।

मामला इतना बढ़ा कि पाकिस्तान ने यहां तक धमकी दी कि अगर मैच रेफ़री को हटाया नहीं गया तो वे यूएई के ख़िलाफ़ मैच खेलने नहीं उतरेंगे। नतीजतन, पाकिस्तान और यूएई का नॉकआउट मैच देर से शुरू हुआ, हालांकि अंततः पाकिस्तान ने यह मुकाबला 41 रनों से जीत लिया।

विशेषज्ञों की राय

पूर्व भारतीय क्रिकेटर और कोच विजय दहिया ने कहा, “परंपरा और नियम में फ़र्क़ होता है। मैच रेफ़री तभी हस्तक्षेप करते हैं जब कोई नियम तोड़ा जाता है। हैंडशेक परंपरा है, नियम नहीं। इससे पहले भी कई मौकों पर टीमों ने आपसी टकराव या परिस्थितियों के चलते ऐसा नहीं किया है।”

उनके मुताबिक, विवाद इसलिए गहराया क्योंकि मैच रेफ़री की ओर से कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं आया।

वहीं वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप मैगज़ीन ने इस विवाद को गहरे राजनीतिक संदर्भ से जोड़ा। उन्होंने कहा, “भारत जब पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलने के लिए सहमत हुआ, तो यह अपने आप में विरोधाभासी कदम है। आप एक तरफ़ पाकिस्तान को आतंकवाद के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं और दूसरी तरफ़ खेल के लिए हामी भरते हैं। सहमति जताने के बाद बीच में इस तरह का रुख़ अपनाना सवाल खड़े करता है।”

वरिष्ठ खेल पत्रकार अयाज़ मेमन और नीरू भाटिया ने भी बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम ‘द लेंस’ में भाग लेते हुए यह सवाल उठाया कि क्या खिलाड़ियों को राजनीतिक विवादों में खींचना ठीक है और क्या खेल की भावना से ऊपर अब स्पॉन्सर्स, राजनीति और पैसे का दबाव हावी होता जा रहा है।

बड़ा सवाल

इस पूरे विवाद ने कई बुनियादी सवाल खड़े किए हैं—

क्या खेल और राजनीति को अलग रखना संभव है?

क्या खिलाड़ियों को केवल खेल तक ही सीमित रखा जाना चाहिए या वे राष्ट्र की भावनाओं के प्रतीक बनकर राजनीतिक संदेश देने के लिए बाध्य हो जाते हैं?

क्या भारत–पाक क्रिकेट अब खेल से ज़्यादा राजनीतिक संदेशों का मंच बन गया है?

अब निगाहें रविवार को होने वाले भारत–पाकिस्तान सुपर-4 मुकाबले पर हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि मैदान के अंदर और बाहर खिलाड़ी किस तरह का व्यवहार करते हैं और आईसीसी इस पूरे विवाद पर क्या रुख अपनाती है।

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