शाम के 4 बजते ही पटना के 10, सर्कुलर रोड पर हलचल तेज़ हो जाती है। ये वही पता है, जहां बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का आवास है — और जहां हर शाम एक लंबी कतार लग जाती है, उम्मीदों और सिफ़ारिशों के साथ।
बीमारियों से जूझते लालू यादव अब भी हर शाम पाँच से सात के बीच आम लोगों से मिलते हैं। सिर हिलाकर या इशारे में ही सही, मगर लोगों के अभिवादन का जवाब देते हैं। भीड़ में हर कोई अपने क्षेत्र, जातीय समीकरण और सियासी आकांक्षाओं का प्रतिनिधि बनकर पहुंचता है — जैसे सहरसा से आए मोहम्मद कासिम, जो चाहते हैं कि इस बार विधानसभा टिकट “पचपनिया” यानी अति पिछड़े वर्ग से किसी को मिले।
“तेजस्वी से मिलना मुश्किल, संजय यादव का ही दबदबा”
इस भीड़ में खड़े एक व्यक्ति की टिप्पणी तेजस्वी यादव की चुनौती को बखूबी बयां करती है — “लालू जी से मिलना तो आसान है, लेकिन पोलो रोड का चक्कर लगाते रहिए, तेजस्वी जी नहीं मिलेंगे। वहाँ सब संजय यादव का प्रभाव है।”
दरअसल, संजय यादव — तेजस्वी यादव के राजनीतिक सलाहकार और राज्यसभा सांसद — इन दिनों लालू परिवार और पार्टी के अंदरूनी समीकरणों के केंद्र में हैं। आरोप लगते हैं कि तेजस्वी के दरबार तक आम कार्यकर्ता की पहुँच अब संजय यादव की मंज़ूरी के बिना नहीं है।
पार्टी के भीतर भी सियासी खींचतान
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) में ये बेचैनी सिर्फ जनता तक सीमित नहीं। लालू यादव की सात बेटियाँ और दो बेटे — जिनमें मीसा भारती, तेज प्रताप यादव, तेजस्वी यादव और रोहिणी आचार्य राजनीति में सक्रिय हैं — के बीच भी सत्ता संतुलन को लेकर लगातार हलचल रहती है।
तेजस्वी यादव को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पहले ही बराबरी का दर्जा और नेतृत्व सौंपा जा चुका है। लेकिन बावजूद इसके, परिवार के भीतर राजनीतिक दाव-पेंच जारी हैं।
बिहार अधिकार यात्रा और सोशल मीडिया विवाद
तेजस्वी यादव की 16 सितंबर से शुरू हुई “बिहार अधिकार यात्रा” भी एक विवाद का कारण बनी। यात्रा के पहले ही दिन संजय यादव की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई, जिसमें वे तेजस्वी के साथ फ्रंट सीट पर बैठे दिखे। इस एक फ़ोटो ने पार्टी कार्यकर्ताओं और परिवार के कुछ सदस्यों के भीतर असंतोष को हवा दे दी।
तेजस्वी के लिए अग्निपरीक्षा का समय
तेजस्वी यादव के सामने अब कई मोर्चे हैं — जनता से सीधा जुड़ाव कम होता जा रहा है, संगठन में भीतरखाने नाराज़गी बढ़ रही है, और परिवार के भीतर सत्ता संतुलन बनाए रखना भी एक जटिल चुनौती बनता जा रहा है।
लालू यादव ने उत्तराधिकारी घोषित तो कर दिया है, लेकिन उत्तराधिकार संभालने का रास्ता अब भी काँटों से भरा है। और सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या तेजस्वी यादव जनता की उस भावनात्मक पकड़ को बरकरार रख पाएंगे, जो कभी लालू यादव की सबसे बड़ी ताकत थी?
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