बिहार की राजनीति हमेशा गठबंधन की जोड़-घटाव पर टिकी रहती है। यहां मुद्दों से ज्यादा मायने रखता है कि किसके साथ कौन खड़ा है और कौन किसको कितना “स्पेस” देने को तैयार है। इसी जोड़-तोड़ के बीच भाकपा माले (लिबरेशन) ने इस बार एक बड़ा दांव खेला है। उसने कांग्रेस की हिचकिचाहट और चुप्पी के बीच तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर दिया है।
कांग्रेस पर ‘औकात’ टिप्पणी, गठबंधन में तकरार
माले महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य का बयान – “औकात से अधिक सीट मांगना ठीक नहीं” – दरअसल सिर्फ नसीहत नहीं, बल्कि कांग्रेस की राजनीति पर कटाक्ष भी है। यह वही कांग्रेस है, जो बिहार में वर्षों से खुद को “किंगमेकर” मानती रही, लेकिन अब उसकी हैसियत पर सवाल उठने लगे हैं। पहले लालू यादव ने इसे दिखाया था, अब माले भी उसी राह पर चलते हुए कांग्रेस को आईना दिखा रही है।
क्रांति से गठबंधन तक का सफर
यहां यह भी दिलचस्प है कि जो माले कभी कांग्रेस को पूंजीपतियों का दल कहकर उसका बहिष्कार करती थी, आज उसी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चुनाव लड़ रही है। कभी भूमिगत क्रांति का सपना देखने वाला यह संगठन अब राजद की छत्रछाया में अपने भविष्य की इबारत लिखना चाहता है। सवाल यह है कि क्या यह वैचारिक समझौता है या फिर राजनीतिक व्यावहारिकता?
स्ट्राइक रेट की राजनीति
2020 विधानसभा चुनाव और 2024 लोकसभा चुनाव में माले का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा।
विधानसभा में 19 सीटों में से 12 जीतकर उसने साबित किया कि उसका स्ट्राइक रेट सबसे बेहतर है।
लोकसभा में 3 में से 2 सीटें जीतकर उसने दिखा दिया कि वह “सिर्फ भराव पार्टी” नहीं है।
इन्हीं नतीजों ने माले को 2025 में 40 सीटें मांगने का साहस दिया है। यह मांग सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का इशारा है – कि गठबंधन में अब वह अपनी भूमिका “जूनियर पार्टनर” से आगे बढ़ाकर “मेन प्लेयर” की तरह देखना चाहती है।
तेजस्वी के लिए बैटिंग या खुद का खेल?
माले का पूरा जोर इस बात पर है कि मुख्यमंत्री चेहरा तेजस्वी यादव ही हों। सतह पर यह बयान राजद को मजबूती देने जैसा लगता है, लेकिन गहराई से देखें तो यह माले के लिए भी फायदेमंद है। तेजस्वी को समर्थन देकर वह गठबंधन में अपनी जगह और मजबूत करना चाहती है। कांग्रेस पर दबाव डालना और सीटें बढ़ाने का तर्क भी इसी रणनीति का हिस्सा है।
निष्कर्ष
बिहार की सियासत में अक्सर कहा जाता है – “यहां कोई स्थायी दोस्त नहीं, सिर्फ स्थायी हित होते हैं।” भाकपा माले का मौजूदा रुख भी यही बताता है। क्रांति का झंडा अब सत्ता की कुर्सी की ओर बढ़ रहा है। सवाल यह है कि 2025 में यह लाल झंडा सिर्फ राजद की छाया में लहराएगा या फिर खुद भी सत्ता की राजनीति में निर्णायक मोहरा बनेगा।
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