नई दिल्ली – सोशल मीडिया आज की दुनिया में सबसे प्रभावी ताकत बन चुका है। लेकिन इसी ताकत के पीछे अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह युवाओं का भविष्य बना रहा है या बिगाड़ रहा है। अमेरिका समेत कई विकसित देशों ने अपने युवाओं को बचाने के लिए फेसबुक, इंस्टाग्राम और अन्य प्लेटफॉर्म पर आयु-आधारित प्रतिबंध लगाए हैं। अमेरिका में 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया पर सीमित एक्सेस दी जाती है। वहीं भारत जैसे देशों में यही प्लेटफॉर्म रील्स और मनोरंजन के नाम पर युवाओं को गुमराह करने का जरिया बन गए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक सुनियोजित राजनीति और मानसिक खेल (Mind Game) है। विकसित देश अपने युवाओं को मोबाइल और रील की लत से बचाकर टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और रिसर्च की ओर मोड़ रहे हैं, जबकि भारत जैसे देशों में युवाओं को नाच-गाने और रील बनाने में उलझाया जा रहा है। इसी विरोधाभास पर एक कहावत तेजी से वायरल हो रही है – “America के बच्चे ऐप बनाते हैं, और India के बैचलर नाचेस हैं और रील बनाते हैं।” यह तुलना न केवल कटाक्ष है बल्कि भारतीय युवाओं की क्षमता और संसाधनों के गलत इस्तेमाल को उजागर करती है।
भारत की युवा आबादी दुनिया की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। लेकिन अगर यही युवा घंटों रील देखने और बनाने में लगे रहेंगे तो यह ऊर्जा और क्षमता नवाचार (innovation), स्टार्टअप संस्कृति और रिसर्च की ओर कैसे मुड़ेगी? विशेषज्ञ मानते हैं कि यही रणनीति विकसित देशों की है – वे अपनी पीढ़ी को प्रोडक्टिव बना रहे हैं और भारत जैसे देशों की युवा शक्ति को मनोरंजन की लत में डुबो रहे हैं।
भारत में इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ रहा है। इंस्टाग्राम, थ्रेड्स, यूट्यूब और फेसबुक पर प्रतिदिन करोड़ों रील अपलोड होती हैं। इनमें से अधिकतर सामग्री मनोरंजन प्रधान होती है, जिसका युवाओं के शैक्षणिक और बौद्धिक विकास से कोई लेना-देना नहीं है। यही कारण है कि समाज के विभिन्न वर्गों से अब यह मांग उठ रही है कि भारतीय सरकार भी अमेरिका और अन्य विकसित देशों की तरह कड़े कदम उठाए।
सुझाव यह दिए जा रहे हैं कि –
आयु-आधारित नियंत्रण (Age Restrictions) लागू किए जाएँ।
रील्स और शॉर्ट वीडियो में अशैक्षणिक व व्यर्थ की सामग्री को सीमित किया जाए।
केवल शैक्षणिक, ज्ञानवर्धक और स्किल डेवलपमेंट कंटेंट को बढ़ावा दिया जाए।
युवाओं को टेक्नोलॉजी, रिसर्च और स्टार्टअप्स की दिशा में प्रोत्साहित करने वाली नीतियाँ बनाई जाएँ।
सोशल मीडिया का प्रभाव इतना गहरा हो चुका है कि इसे पूरी तरह बैन करना संभव नहीं है, लेकिन इसे नियंत्रित करना आज समय की सबसे बड़ी ज़रूरत बन चुका है।
? सवाल यही है कि क्या भारतीय सरकार अमेरिकी मॉडल की तरह कड़े नियम बनाएगी, या फिर भारतीय युवा अपनी ऊर्जा और समय रील्स व वर्चुअल मनोरंजन में ही बर्बाद करते रहेंगे?
यह बहस अब केवल तकनीक की नहीं, बल्कि भारत के भविष्य और राष्ट्रीय हित की बन चुकी है।
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