करमा पूजा : झारखंड का अद्भुत लोकपर्व

करमा पूजा : झारखंड का अद्भुत लोकपर्व

झारखंड की धरती आदिवासी संस्कृति, परंपरा और लोकगीतों से समृद्ध है। इन्हीं परंपराओं में से एक है करमा पूजा, जिसे झारखंड के लोग बड़े धूमधाम से मनाते हैं।—

करमा पूजा की कथा

मान्यता है कि करम देवता धरती पर सुख-समृद्धि, साहस और सौभाग्य का आशीर्वाद देते हैं। कथा के अनुसार एक बार सात भाइयों की बहन ने उपवास कर करम देवता की पूजा की। लेकिन भाइयों ने उपवास और पूजा का मज़ाक उड़ाकर करम की डाल को फेंक दिया। इससे करम देवता क्रोधित हो गए और भाइयों के घर में अकाल व विपत्ति आने लगी। जब बहन ने फिर से करम देवता की आराधना की और क्षमा मांगी, तब जाकर उनका घर सुख-समृद्धि से भर गया।इस कथा के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि धरती, पेड़-पौधों और प्रकृति का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि वही जीवन का आधार हैं।

कैसे मनाई जाती है पूजा

पूजा से 9 दिन पहले अविवाहित लड़कियाँ जावा (धान, जौ आदि के बीज) बोती हैं और उन्हें पानी देकर उगाती हैं।पर्व के दिन गाँव की महिलाएँ और युवक करम वृक्ष की डाल तोड़कर उसे गाँव या घर के आंगन में स्थापित करते हैं।डाल को दूध, दही, हल्दी और चावल से धोकर सजाया जाता है।ढोल-मांदर की थाप पर पूरी रात करमा गीत और करमा नृत्य (करमा नाच) किया जाता है।पूजा के बाद भाई-बहन एक-दूसरे की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।अगले दिन करम डाल को नदी या तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है।—

झारखंड में उत्सव का रंग

झारखंड के आदिवासी समाज जैसे मुण्डा, उरांव, हो, संथाल, भूमिज समुदाय इस दिन को बेहद उल्लास और आस्था के साथ मनाते हैं। गाँव-गाँव में गीत गूंजते हैं, युवा झूम-झूम कर नाचते हैं और महिलाएँ पारंपरिक परिधान पहनकर पूजा में शामिल होती हैं। यह पर्व न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता और भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को भी मजबूत बनाता है।—

संक्षेप में,

करमा पूजा झारखंड की आत्मा है, जिसमें प्रकृति, भाई-बहन का बंधन और सामूहिक आनंद समाहित है।

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